सैद्धांतिक रूप से एम. आर. पी. अथवा अधिकतम खुदरा बिक्री मूल्य की गणना में उत्पाद की वास्तविक लागत (प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष) और लाभ के साथ ही वितरण का खर्चा और वितरकों का लाभ जुड़ा होने के साथ ही उसपर खुदरा विक्रेताओं के लाभ जीएसटी सहित सभी कर आदि जुड़े होते है।
लेकिन वर्तमान में, इस प्रक्रिया में उत्पादकों द्वारा अधिकतम खुदरा मूल्य मनमाने ढंग से निर्धारित की जाती हैं। चूंकि उपभोक्ताओं को ‘वास्तविक विनिर्माण लागत’ का पता नहीं चलता इसलिए उन्हे उत्पादों को “वास्तविक” विनिर्माण लागत की तुलना में बहुत अधिक कीमत पर सामान खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ता है।
इस प्रकार, हम देखते है की वर्तमान एम.आर.पी. प्रक्रिया में वस्तु पर लिखी “अधिकतम खुदरा मूल्य वस्तु की वास्तविक मूल्य” नहीं होती है। हम सभी दवाइयों जैसी जरूरी उत्पाद की मनमानी कीमत से रोज जूझते है। उत्पादक मनमाने ढंग से कीमत तय करते है और उपभोक्ता ‘अधिकतम’ कीमत पर सामान खरीदने के लिए मजबूर होते हैं।
लेकिन यदि, उत्पादकों के लिए “अधिकतम खुदरा कीमत” के साथ ही उत्पाद बनाने में लगी सहायक वस्तुओं की “वास्तविक लागत” भी छापना अनिवार्य कर दिया जाए, तो इससे उपभोक्ता -ग्राहक के हितों का कहीं अधिक बेहतर तरीके से संरक्षण किया जा सकेगा।
वास्तव में,उपभोक्ताओ के हितों के संरक्षण के लिये समय समय पर सरकारों द्वारा वैधानिक प्रयास किए जाते रहे है। जैसे की सन् 1990 के दौर में, पैकेज्ड कमोडिटीज नियम-1976 में संशोधन करके सभी पैकेज्ड वस्तुओं पर अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) लिखने की शुरूआत नागरिक आपूर्ति मंत्रालय द्वारा ग्राहक के हितों का संरक्षण हेतु की गई थी। लेकिन बाद में इसके अपेक्षित परिणाम नहीं मिलने की वजह से संन् 2006 में, ‘उपभोक्ता वस्तुएँ विधेयक-2006’ द्वारा उत्पादन लागत और अधिकतम खुदरा मूल्य की अनिवार्य छपाई के लिए अधिनियम पारित किया गया। इस अधिनियम का उद्देश्य बाज़ारों में बिकने वाली ‘उपभोक्ता वस्तुओं’ पर उत्पादन लागत सहित कीमतों की छपाई अनिवार्य रूप से करने की व्यवस्था की गयी।
इसी प्रकार, वर्तमान आर्थिक उदारीकरण के मद्देनजर भी नीति निर्माताओ को उपभोक्ता / ग्राहक के हितों को कहीं और बेहतर तरीके से पुष्ट व संरक्षित करने के लिए यह जरूरी है की उपभोक्ता अथवा खरीददार यह जान सके की जो भी सामान खरीदने जा रहे हैं उसकी “वास्तविक विनिर्माण लागत” क्या है।
“वास्तविक विनिर्माण लागत” एक ऐसी पारदर्शी छलावा रहित व्यवस्था हो सकती है जिससे उपभोक्ताओं को उत्पाद खरीदने के संबंध में निर्णय लेने में मदद मिले।
इस संदर्भ में नीति निर्माताओं को अब इंन दो तथ्यों को स्वीकार करना जरूरी हो गया है की (1) उपभोक्ता ही उत्पादकों के “ग्राहक” हैं। केवल ‘उत्पादों’ के ही नहीं बल्कि ‘सेवाओं’ के भी ग्राहक हैं। (2) जब हम किसी से भी, यदि कोई “वस्तु या सेवाएं” खरीदते है, उस स्थिति में हमसे / ग्राहक से सरकारों को, उत्पादकों को व सेवा प्रदाताओं को भी ‘’आदमनी’’ होती है।
ऐसे में,“ग्राहकों का मौलिक अधिकार” होगा की उन्हें उत्पाद, सर्विसेस, आदि वास्तविक से अधिक मूल्य पर न लेने पड़े। और यह तभी संभव है जब हमे “अधिकतम खुदरा कीमत” के साथ ही वस्तुओं के उत्पादन की “वास्तविक लागत” का भी पता हो। जबकि वर्तमान में एम. आर. पी के आगे केवल “भ्रामक मूल्य” मात्र ही लिखा होता है ।
इस भ्रामक मूल्य व्यवस्था को तोड़ने और ग्राहकों के वस्तु और सेवा पाने के “मौलिक अधिकार” को वैधानिक तौर पर सुनिश्चित करने के लिए, वर्तमान कंज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट के “स्वरूप व प्रक्रियागत व्यवस्था’’ में थोड़ा बदलाव करके कंज्यूमर कोर्ट को ‘’ऑटो मोड’’ पर लाना होगा। साथ ही इसके “अधिकार क्षेत्र” में ‘सरकारी – गैर सरकारी’ सहित सभी प्रकार की ‘वस्तुओं और सेवाओं’ को चाहे राज्य या केंद्र सरकार द्वारा लगाए गए इनकम टैक्स हों, जीएसटी हो, संपत्ति कर हो, टोल टैक्स हो या रजिस्ट्री सेवाएं हों, सभी को शामिल किया जाना चाहिए। और सर्विस में कमी की “हर्जाना पूर्ति” सीधे ग्राहकों को दिए जाने की व्यवस्था करनी चाहिए।



