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Home»राज्य समाचार»उत्तराखण्ड»बलिदान दिवस 31 अक्टूबर पर नियमित श्रीमद्भागवत गीता पढ़कर गोसेवा भी करती थी इंदिरा गांधी !
उत्तराखण्ड

बलिदान दिवस 31 अक्टूबर पर नियमित श्रीमद्भागवत गीता पढ़कर गोसेवा भी करती थी इंदिरा गांधी !

Pahad ki KhabarBy Pahad ki KhabarOctober 31, 2023Updated:July 5, 2025No Comments
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भारत के प्रधानमंत्री के रूप में दुनिया का नक्शा बदलने में सफल रही इंदिरा गांधी अपने फौलादी इरादों के लिए विख्यात रही है। बड़े से बड़ा फैसला बेखौफ लेने वाली देश की पहली महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की 31 अक्टूबर सन 1984 की सुबह उनके अंगरक्षकों ने हत्या कर दी थी। इंदिरा गांधी ने सन 1966 से सन 1977 के बीच लगातार तीन बार देश की बागडोर संभाली और उसके बाद 1980 में दोबारा इस प्रधानमंत्री के पद पर पहुंचीं थी, 31 अक्टूबर 1984 को पद पर रहते हुए ही उनकी हत्या हुई थी।उनके भीतर गजब की राजनीतिक दूरदर्शिता थी। इंदिरा गांधी का जन्म 19 नवंबर, सन1917 को इलाहाबाद में हुआ था। उनके पिता पंडित जवाहर लाल नेहरू आजादी की लड़ाई का नेतृत्व करने वाले स्वतंत्रता संग्राम सेनानी व देश के प्रथम प्रधानमंत्री  थे। जब सन1919 में उनका परिवार बापू के सानिध्य में आया और इंदिरा गांधी ने पिता पंडित नेहरू से राजनीति का पहला कायदा पढा।तब मात्र 11 साल की उम्र में उन्होंने ब्रिटिश शासन का विरोध करने के लिए बच्चों की वानर सेना बना दी थी। सन1938 में वह औपचारिक तौर पर इंडियन नेशनल कांग्रेस में शामिल हुईं और सन 1947 से सन 1964 तक अपने प्रधानमंत्री पिता पंडित नेहरू के साथ उन्होंने राजनीतिक प्रशिक्षण प्राप्त किया। उस समय वह प्रधानमंत्री पंडित नेहरू की निजी सचिव की तरह काम करती थीं, हालांकि  आधिकारिक तौर पर ऐसा नही था।पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को राजनीति विरासत में मिली थी और ऐसे में सियासी उतार-चढ़ाव को वह बखूबी समझती थीं। यही वजह रही कि उनके सामने न सिर्फ देश, बल्कि विदेश के नेता भी उन्नीस नजर आने लगते थे।  पिता पंडित नेहरु के निधन के बाद कांग्रेस पार्टी में इंदिरा गांधी का ग्राफ अचानक काफी ऊपर पहुंचा और लोग उनमें पार्टी एवं देश का नेता देखने लगे थे। वह सबसे पहले लाल बहादुर शास्त्री के मंत्रिमंडल में सूचना एवं प्रसारण मंत्री बनीं। शास्त्री जी के निधन के बाद सन 1966 में वह देश के सबसे शक्तिशाली पद ‘प्रधानमंत्री’ की कुर्सी पर आसीन हुईं। कभी ‘गूंगी गुडिया’ कही जाने वाली इंदिरा गांधी ने बैंकों का राष्ट्रीयकरण करने जैसा साहसिक फैसला लेने और पृथक बांग्लादेश के गठन और उसके साथ मैत्री और सहयोग संधि करने में सफल रही।सन 1975 में आपातकाल लागू करने का फैसला करने से चारों तरफ इंदिरा ही इंदिरा नजर आती थीं। इंदिरा की ऐतिहासिक कामयाबियों के चलते उस समय देश में ‘इंदिरा इज इंडिया, इंडिया इज इंदिरा’ का नारा जोर-शोर से गूंजने लगा था। अपने व्यक्तित्व को व्यापक बनाने के लिए उन्होंने खुद भी प्रयास किया। इंदिरा गांधी के बारे में सबसे सकारात्मक बात यह है कि वह राजनीति की नब्ज को समझती थीं और अपने साथियों से उनका बेहतरीन तालमेल था।

गरीबी मुक्त भारत इंदिरा गांधी का एक सपना था। उनके इस सपने को साकार करने के लिए सभी लोगों को भारत से गरीबी को मिटाने के लिए मिलकर काम करना चाहिए, ताकि उनके सपने को हकीकत में तब्दील किया जा सके।  जनता पार्टी के शासनकाल में श्रीमती इंदिरा गांधी पूरी तरह आध्यात्मिकता की ओर उन्मुख हो गई थीं। उन दिनों सुबह-सवेरे के नित्यकर्मों से विमुक्त होने के बाद वे लगभग एक घंटे तक योगाभ्यास करती थीं,गोशाला में जाकर गायों की सेवा और तत्पश्चात मा आनंदमयी के उपदेशों का मनन,उनकी दिनचर्या में शामिल था। सुबह दस बजे से लेकर बारह बजे के मध्य वे आगंतुक दर्शनार्थियों से मिलती थीं। इन अतिथियों में विभिन्न प्रदेशों के कांग्रेसी नेताओं के अतिरिक्त कतिपय साधु-संत भी होते थे। अपनी उन भेंट-मुलाकातों के मध्य आमतौर पर श्रीमती गांधी के हाथों में ऊन के गोले और सलाइयां रहती थीं। अपने स्वजनों के लिए स्वेटर आदि बुनना उन दिनों उनकी हॉबी बन गई थी। 

एक बजे के लगभग भोजन करने के बाद वे घंटेभर विश्राम करती थीं। विश्राम के बाद अक्सर वे पाकिस्तान के मशहूर गायक मेहंदी हसन की गजलों के टेप सुनती थीं। रात में सोने से पहले उन्हें आध्यात्मिक साहित्य का पठन-पाठन अच्छा लगता था। इस साहित्य में मा आनंदमयी के अतिरिक्त स्वामी रामतीर्थ और ओशो की पुस्तकें प्रमुख थीं। ओशो के कई टेप भी उन्होंने मंगवा रखे थे, जिनका वे नियमित रूप से श्रवण करती थीं। 

श्रीमद् भगवत गीता में भी इस दरम्यान उनकी पर्याप्त रुचि हो गई थी। समय-समय पर वे उसका भी पारायण करती थीं। उन्हीं दिनों कुछ समय के लिए वे हरिद्वार भी गई थीं, जहां स्वामी अखंडानंद के भगवत पाठ का उन्होंने श्रवण किया था। ऋषिकेश के निकट मुनि-की-रेती पर अवस्थित स्वर्गत स्वामी शिवानंद के आश्रम में भी उन्होंने कुछ घंटे व्यतीत किए थे। 

इंदिरा की राजनीतिक छवि को आपातकाल की वजह से गहरा धक्का लगा था। इसी कारण सन 1977 में देश की जनता ने उन्हें नकार दिया था, हालांकि कुछ वर्षों बाद ही फिर से सत्ता में उनकी वापसी हो गई थी। उनके लिए सन 1980 का दशक खालिस्तानी आतंकवाद के रूप में बड़ी चुनौती लेकर आया। 

‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ को लेकर उन्हें कई तरह की राजनीतिक समस्याओं का सामना करना पड़ा। राजनीति की नब्ज को समझने वाली इंदिरा मौत की आहट को तनिक भी भांप नहीं सकीं और 31 अक्टूबर, 1984 को उनकी सुरक्षा में तैनात दो सुरक्षाकर्मियों सतवंत सिंह और बेअंत सिंह ने उन्हें गोली मार दी। दिल्ली के एम्स ले जाते समय उनका निधन हो गया।इंदिरा गांधी ने अपनी शहादत के एक दिन पहले ही कहा था कि ‘मैं रहूं न रहूं मेरे शरीर के खून का एक एक कतरा देश के काम आएगा।’जो अक्षरसः सच साबित हुआ। देश के अन्दर समाज के आखिरी व्यक्ति के चेहरे पर खुशहाली लाने के लिए इन्दिरा गांधी हमेशा बेचैन रहती थी।गजब की फूर्तिली व देश तथा समाज के लिए हमेशा अच्छा सोचने वाली इन्दिरा गांधी ने दुनिया भर में भारत को नई पहचान देने का काम किया। उन्होने अपने रहते कभी तिरंगें को झुकने नही दिया और भारत का लौहा दुनिया भर में मनवाया।  इन्दिरा गांधी देश के गरीबों की मसीहा थी जिन्होने जीवन पर्यन्त ग्राम स्तर के विकास कार्यक्रम चलाकर गरीबो को खुशहाल बनाकर उनके चेहरे पर मुस्कान लाने की कौशिश की। उन्ही के द्वारा शुरू किये गए विकास कार्यक्रम आज भी गरीबोत्थान का आधार बने हुए है। जो हमेशा हमे इन्दिरा जी की याद दिलाते रहेगें।

इन्दिरा गांधी की अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं पर उनकी विशेष पकड होती थी। साधारण से साधारण कार्यकर्ता को नाम लेकर बुलाना और उन पर विश्वास करना उनकी कार्यशैली का हिस्सा हुआ करता था। निर्णय लेने की जो क्षमता इन्दिरा गांधी में थी वह क्षमता आज किसी भी दूसरे  नेता में देखने को नही मिलती।पाकिस्तान को धुल चटाकर बंगलादेश को जन्म देने वाली इन्दिरा गांधी के दुनियाभर के देश इस कदर कायल थे कि उन्हे 165 देशो के संगठन का अध्यक्ष तक बना दिया था। भारत में ऐसा सम्मान आज तक कोई दूसरा नेता प्राप्त नही कर पाया है। इन्दिरा जी का लोहा उनके विरोधी भी मानते थे।आपात काल के मजबूरीवश लिए गए निर्णय से हुए नुकसान को दरकिनार कर दे तो इन्दिरा हमेंशा अपने लिए गए निर्णयों से फायदे में ही रही। सच यह भी है कि जो विकास प्रथम प्रधानमन्त्री पंडित जवाहर लाल नेहरू और इन्दिरा गांधी के जमाने में हुआ, उतने विकास की कल्पना फिर कभी साकार नही हुई। कांग्रेस शासन काल में जब जब भी सत्ता की बागडोर नेहरू परिवार के बजाए किसी ओर के हाथों में आई तब तब ही कांग्रेस को विवादो मे धिसटना पडा। हांलाकि पूर्व प्रधानमन्त्री मनमोहन सिहं स्वयं में एक सफल प्रधानमन्त्री  रहे है लेकिन उन्हे अपने कई सहयोगी मन्त्रियो के भ्रष्टाचार में लिप्त पाए जाने के कारण परेशानी भी झेलनी पडी। वह तो कांग्रेस अध्यक्ष रही सोनिया गांधी की सुझ बूझ से भ्रष्टो के प्रति कोई रियायत न बरतकर एक सही संकेत देने की कौशिश की गई वरना हालात और भी खराब हो जाते । ऐसे में इन्दिरा गांधी की याद हो आती है जिन्होने हमेशा सही वक्त पर सही निर्णय लेकर कांग्रेस को जिन्दा रखा और देश को भी नई सोच दी। उन्होने देश के लिए अपने खून का एक एक कतरा बहाकर यह साबित कर दिया था कि उनकी कथनी और करनी एक समान थी।इन्दिरा गांधी देश की सीमाओं के प्रति और अपने बहादुर सैनिको के हितो के प्रति हमेशा संवेदनशील रही। देश का विकास कैसे हो यह उनकी पहली सोच हुआ करती थी। साथ अपने कार्यकर्ताओं का सम्मान करना उन्हे बखूबी आता था। कांग्रेस के सत्ता में होते हुए वे कभी अपने कार्यकर्ताओं को सत्ता से जोडना नही भूलती थी।कडी मेहनत,पक्का इरादा,दूरदृष्टि जैसे जीवन सूत्र दुनिया को देने वाली इन्दिरा गांधी ने बीस सूत्री कार्यक्रम देश मे लागू कर गांव स्तर पर विकास का रास्ता तैयार किया। वे चाहती थी कि सबसे पहले गांव खुशहाल हो तो देश अपने आप खुशहाल हो जाएगा।इसी सोच ने उन्हें महान बनाया।(लेखक राजनीतिक चिंतक एवं वरिष्ठ पत्रकार है)

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