भारत की सांस्कृतिक आत्मा को अपनी आवाज़ से समृद्ध करने वाली स्वर-कोकिला लता मंगेशकर केवल एक गायिका नहीं थीं, बल्कि वे भावनाओं की जीवंत अभिव्यक्ति थीं। उनकी पुण्यतिथि पर समूचा देश उस दिव्य स्वर को श्रद्धा से स्मरण करता है, जिसने दशकों तक भारतीय जनमानस के हृदय में अपनी अमिट छाप छोड़ी।
लता जी की आवाज़ में भक्ति थी, प्रेम था, विरह था, देशभक्ति का जोश था और जीवन की गहराई भी। उनके गाए गीत केवल सुने नहीं गए, बल्कि महसूस किए गए। “ऐ मेरे वतन के लोगों”, “लग जा गले”, “तेरे बिना ज़िंदगी से कोई” जैसे अनगिनत गीत आज भी भावनाओं को उसी तरह झकझोर देते हैं, जैसे पहली बार सुने गए हों।
28 सितंबर 1929 को जन्मी लता मंगेशकर जी ने बहुत कम उम्र में संघर्षों के बीच संगीत की साधना शुरू की। कठिनाइयों को पार करते हुए उन्होंने भारतीय फिल्म संगीत को एक नई ऊँचाई दी। उनका स्वर इतना शुद्ध, संयमित और आत्मा को छू लेने वाला था कि वे सुरों की देवी कहलाईं।
उन्हें भारत रत्न सहित अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मानों से सम्मानित किया गया, पर उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि जनता का अटूट प्रेम रहा। वे सादगी, अनुशासन और कला के प्रति समर्पण की सच्ची मिसाल थीं।
लता मंगेशकर भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनका स्वर समय की सीमाओं से परे अमर है। उनकी पुण्यतिथि पर हम उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए यह स्वीकार करते हैं कि भारतीय संगीत की आत्मा में लता जी सदैव जीवित रहेंगी।
स्वर-कोकिला को शत्-शत् नमन। 🎶🙏



