दून विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ एनवायरनमेंट एंड नेचुरल रिसोर्सेज द्वारा “गज महोत्सव” का आयोजन किया गया। INTACH और वाइल्डलाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया की पहल पर आयोजित इस कार्यक्रम में देशभर के संरक्षण विशेषज्ञों, शोधकर्ताओं, शिक्षकों और विद्यार्थियों ने भाग लिया। कार्यक्रम के दौरान हाथियों के पारिस्थितिक व सांस्कृतिक महत्व, जैव विविधता संरक्षण तथा मानव–वन्यजीव सह-अस्तित्व जैसे विषयों पर विस्तृत चर्चा की गई।
मुख्य अतिथि कुलपति प्रो. सुरेखा डंगवाल ने कहा कि विश्वविद्यालयों को केवल ज्ञान देने तक सीमित न रहकर सतत विकास, शोध और सामाजिक उत्तरदायित्व के केंद्र के रूप में कार्य करना चाहिए। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में बढ़ती पर्यावरणीय चुनौतियों के बीच शैक्षणिक संस्थानों की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो गई है, और ऐसे कार्यक्रम विद्यार्थियों को व्यवहारिक ज्ञान के साथ संवेदनशील बनाते हैं।डॉ. वी.बी. माथुर ने संरक्षण के लिए नीति स्तर और जमीनी स्तर पर समन्वित प्रयासों की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि मानव–वन्यजीव संघर्ष आज एक बड़ी चुनौती बन चुका है। इसे कम करने के लिए विज्ञान, नीति, प्रशासन और स्थानीय समुदाय के बीच बेहतर तालमेल जरूरी है।
उन्होंने संरक्षण को व्यापक परिदृश्य स्तर पर लागू करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया।कार्यक्रम में डॉ. रसिली ने राजाजी राष्ट्रीय उद्यान के अनुभव साझा करते हुए आवासीय संपर्क (हैबिटेट कनेक्टिविटी) और प्रभावी प्रबंधन को संरक्षण का आधार बताया। वहीं डॉ. बिलाल हबीब ने हाथियों के व्यवहार और उनके आवागमन को समझने की आवश्यकता पर बल दिया, जिससे प्रभावी संरक्षण रणनीतियां तैयार की जा सकें। डॉ. अनिल कुमार सिंह ने कॉरिडोर प्रबंधन और संघर्ष निवारण के वैज्ञानिक उपायों पर चर्चा की तथा समुदाय की भागीदारी को अहम बताया।
इस अवसर पर ‘एलीफेंट: लॉर्ड ऑफ द जंगल’ और ‘हाथीबंधु’ नामक लघु फिल्मों का प्रदर्शन भी किया गया, जिससे प्रतिभागियों को विषय की गहराई से समझ मिली। कार्यक्रम ने विद्यार्थियों को वास्तविक संरक्षण चुनौतियों से रूबरू कराने के साथ-साथ फील्ड आधारित और अंतःविषय शिक्षा के महत्व को भी रेखांकित किया।
अंत में डॉ. अंजली भारती ने सभी अतिथियों, वक्ताओं और प्रतिभागियों का धन्यवाद ज्ञापित किया।



