टिहरी गढ़वाल। हेमवती नन्दन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय के स्वामी रामतीर्थ परिसर, बादशाही थौल में शोधार्थियों की पहल पर स्थापित अंतर्विषयी रचनात्मक मंच “मंथन” निरंतर अपनी सार्थक उपस्थिति दर्ज करा रहा है। शोधार्थियों के बौद्धिक, अकादमिक एवं रचनात्मक विकास को ध्यान में रखते हुए इस मंच की स्थापना आपसी विचार-विमर्श के पश्चात की गई थी।
“मंथन” मंच की स्थापना का मुख्य उद्देश्य विभिन्न विषयों के शोधार्थियों के मध्य संवाद, विचार-विनिमय तथा आत्म-अभिव्यक्ति के लिए एक स्वतंत्र और सकारात्मक वातावरण उपलब्ध कराना है। वर्तमान समय में शोध केवल विषय-विशेष तक सीमित न रहकर बहुआयामी स्वरूप ग्रहण कर चुका है, ऐसे में यह मंच शोधार्थियों को अपने विचारों, ज्ञान एवं रचनात्मक प्रतिभा को निःसंकोच अभिव्यक्त करने का अवसर प्रदान करता है।
मंच के गठन के पीछे यह भी अनुभव रहा कि अनेक शोधार्थी अपनी अभिव्यक्ति को प्रस्तुत करने में संकोच करते हैं तथा उनके बीच नियमित संवाद का अभाव रहता है। “मंथन” इस कमी को दूर करते हुए “प्रतिस्पर्धा नहीं, सहभागिता” की भावना को विकसित करता है।
इस मंच के संरक्षक एवं मार्गदर्शक के रूप में स्वामी रामतीर्थ परिसर के निदेशक प्रो० ए० ए० बौडाई का संरक्षण प्राप्त है। वहीं मंच के संचालन हेतु शोधार्थियों द्वारा दायित्व निर्धारित किए गए हैं, जिनमें संयोजक धनेश्वर द्विवेदी (संस्कृत विभाग), सह-संयोजक सुनील कुमार (रक्षा, स्त्रातजिक एवं भू-राजनीतिक अध्ययन विभाग), समन्वयक यशिका राणा (गृह विज्ञान विभाग) तथा सह-समन्वयक मनोज सिंह (हिन्दी विभाग) प्रमुख हैं।
*कार्यक्रम सफलतापूर्वक सम्पन्न*
“मंथन” मंच का कार्यक्रम दिनांक 06 अप्रैल 2026 को उत्साहपूर्वक आयोजित किया गया। कार्यक्रम का शुभारम्भ वैदिक मंत्रोच्चार से किया गया, जिससे वातावरण आध्यात्मिक एवं सौम्य बन गया।
कार्यक्रम में संयोजक धनेश्वर द्विवेदी ने अपने वक्तव्य में कहा कि “मंथन” मंच शोधार्थियों के लिए केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक सतत बौद्धिक यात्रा है, जहाँ विचारों का आदान-प्रदान नए दृष्टिकोणों को जन्म देता है। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में अंतर्विषयी संवाद अत्यंत आवश्यक है, और “मंथन” इसी आवश्यकता की पूर्ति करते हुए शोधार्थियों को आत्मविश्वासपूर्वक अपनी अभिव्यक्ति प्रस्तुत करने का अवसर प्रदान कर रहा है।
इस अवसर पर सह-संयोजक सुनील कुमार ने कहा कि “मंथन” मंच शोधार्थियों के ज्ञानवर्धन के साथ-साथ उनके व्यक्तित्व-विकास का भी सशक्त माध्यम बन रहा है। उन्होंने बल दिया कि ऐसे आयोजनों से न केवल शैक्षणिक समझ का विस्तार होता है, बल्कि शोधार्थियों में संवाद, प्रस्तुतीकरण एवं समन्वय की क्षमता भी विकसित होती है।
समन्वयक यशिका राणा ने अपने वक्तव्य में कहा कि “मंथन” मंच विविध विषयों के शोधार्थियों को एक साझा मंच प्रदान कर उन्हें एक-दूसरे के अनुभवों से सीखने का अवसर देता है। उन्होंने कहा कि यह मंच शोध को केवल पुस्तकालय तक सीमित न रखकर उसे व्यवहारिक एवं सामाजिक संदर्भों से जोड़ने का कार्य कर रहा है।
सह-समन्वयक मनोज सिंह ने कहा कि “मंथन” मंच ने अल्प समय में ही शोधार्थियों के बीच रचनात्मकता एवं साहित्यिक चेतना को प्रोत्साहित किया है। उन्होंने कहा कि यह मंच न केवल अकादमिक प्रस्तुति का अवसर देता है, बल्कि शोधार्थियों की सृजनात्मक अभिव्यक्ति, जैसे कविता, लेखन आदि, को भी समान महत्व प्रदान करता है। इसके पश्चात विभिन्न शोधार्थियों द्वारा साहित्यिक एवं अकादमिक प्रस्तुतियाँ दी गईं।
कार्यक्रम में शोधार्थिनी सृष्टि शर्मा ने “सामाजिक विज्ञान अनुसंधान में क्षेत्र कार्य का महत्व” इस विषय पर अपने फील्ड वर्क का अनुभव (पीपीटी) के माध्यम से सभी शोधार्थियों के साथ साझा किया।
संस्कृत विभाग के शोधार्थी द्विवेदी ने “भारतीय ज्ञान परंपरा में मानव मूल्य एवं नैतिक शिक्षा” इस विषय पर प्रभावशाली (पीपीटी) के माध्यम से अपनी प्रस्तुति दी। वहीं शोधार्थिनी दिव्या काला एवं शोधार्थी मनोज सिंह ने अपनी स्वरचित कविताओं से वातावरण को साहित्यिक बना दिया।
शोधार्थी सुनील कुमार द्वारा “शैक्षणिक आयोजनों की शब्दावली: वे शब्द जिन्हें आपको जानना आवश्यक है” इस विषय पर आधारित ज्ञानवर्धक प्रस्तुति (पीपीटी) के माध्यम से दी गई, जबकि सुधांशु सोनी ने अपने शोध से संबंधित मौलिक विचार प्रस्तुत किए। वहीं इस अवसर पर विभिन्न शोधार्थियों ने अपनी शोध-यात्रा के अनुभव साझा किए।
कार्यक्रम का सफल मंच संचालन अंग्रेजी भाषा में समन्वयक यशिका राणा एवं हिन्दी भाषा में सह-समन्वयक मनोज सिंह ने किया तथा अंत में शोधार्थी द्विवेदी ने धन्यवाद ज्ञापन किया। कार्यक्रम का समापन शांति-पाठ के साथ किया गया।
इस अवसर पर धनेश्वर द्विवेदी, सुनील कुमार, यशिका राणा, मनोज सिंह, दिव्या काला, सृष्टि शर्मा, प्रियंका बिष्ट, सुधांशु सोनी, त्रिलोक नाथ, सोराम मैत्तई, वैशाली जोशी, रश्मि राणा आदि शोधार्थी उपस्थित रहे।



