
भ्रष्टाचार के बल पर सरकार चलाने वाले नेपाल के पूर्व पीएम केपी शर्मा ओली का युवाओं ने तख्तापलट कर दिया। इसके बावजूद ओली की अकड़ नहीं गई । नेपाल में हुए हिंसक वारदात और अपनी सरकार का तख्तापलट का दोष भारत पर मढ़ दिया है। नेपाल के पूर्व पीएम केपी शर्मा ओली ने नाम लिए बिना तख्तापलट के लिए भारत को दोष दिया है। उन्होंने कहा कि राम नेपाल में जन्में थे और लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा हमारा है। मैं इन बयानों से पीछे हट जाता तो मुझे और मौके मिलते।नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली लंबे समय से
भारत के खिलाफ विरोधी बयान देते रहे हैं। इस नेता को चीन का समर्थक माना जाता है। 10 साल पहले 2015 में नेपाल में आए नए संविधान के बाद भारत-नेपाल संबंध तनावपूर्ण हुए। उस समय ओली ने कहा था कि भारत ने नेपाल पर “अघोषित नाकाबंदी” थोप दी है। उन्होंने भारत पर आरोप लगाया था कि नेपाल की जनता को खाने-पीने की वस्तुएं, ईंधन और दवाइयों से वंचित करने की साजिश की गई। ओली ने कहा था कि भारत नेपाल की स्वतंत्र विदेश नीति नहीं चाहता और हर सरकार को दबाव में लेकर अपनी बात मनवाता है। वहीं 2020 में नक्शा विवाद के दौरान उन्होंने संसद में कहा था “भारत ने हमारी जमीन पर कब्जा कर रखा है और अब हम अपनी भूमि वापस लेंगे। उसी दौरान उन्होंने यह भी कहा था कि नेपाल-भारत सीमा विवाद को हवा देने के पीछे भारत की ‘विस्तारवादी नीति’ है। उन्होंने भारत को “कोरोना से भी बड़ा वायरस” करार दिया था और कहा था कि भारत से नेपाल में संक्रमण आ रहा है। ओली ने कई बार यह आरोप दोहराया कि भारत नेपाल की राजनीति में सत्ता परिवर्तन करवाने में शामिल रहता है। यहां तक कि नेपाल के कुछ मीडिया घरानों को भी भारत का समर्थक बताते हुए उन्होंने कहा था कि भारत पैसे और दबाव से नेपाल में माहौल बिगाड़ता है। पिछले दिनों चीन में शंघाई शिखर सम्मेलन के दौरान भी नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ने राष्ट्रपति शी जिनपिंग के सामने लिपुलेख का मुद्दा उठाया था। उनके इस बयान पर चीनी राष्ट्रपति ने सीधे ही कहा इस मामले में आप भारत के साथ बात कीजिए। फिलहाल नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री किसी अज्ञातवास में समय काट रहे हैं। सरकार चली गई गद्दी चली गई फिर भी ओली की अकड़ नहीं गई ।
नेपाल की पूर्व चीफ जस्टिस रह चुकीं सुशीला कार्की देश की अंतरिम पीएम बन गई हैं। सुशीला कार्की किसान परिवार में जन्मीं हैं और 7 भाई-बहनों में सबसे बड़ी हैं। पिता चाहते थे कि वे डॉक्टर बनें। उन्होंने बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी (बीएचयू) से राजनीति शास्त्र में मास्टर्स किया है। उन्होंने 1979 में वकालत में अपना करियर शुरू किया। सुशीला कार्की 11 जुलाई 2016 से 6 जून 2017 तक नेपाल की पहली महिला मुख्य न्यायाधीश थीं। 2017 में उनके खिलाफ महाभियोग लाया गया था। सुशीला कार्की पर पूर्वाग्रह और कार्यपालिका में हस्तक्षेप का आरोप लगा था। सुशीला ने कई हाई-प्रोफाइल मामलों में फैसले दिए हैं। सुशीला ने अपने करियर की शुरुआत शिक्षक के रूप में की थी और बाद में जज बनीं। जब सुशीला 2016 में नेपाल की पहली महिला चीफ जस्टिस बनीं, तो यह अपने आप में ऐतिहासिक था। एक साल बाद 2017 में उन पर संसद में महाभियोग प्रस्ताव लाया गया। आरोप लगाया गया कि वे फैसलों से राजनीतिक दबाव के खिलाफ खड़ी हो रही हैं और न्यायपालिका की आजादी का गलत इस्तेमाल कर रही हैं। असल में, नेताओं को डर था कि अगर कार्की कोर्ट में ऐसे ही सख्ती दिखाती रहीं, तो उनसे राजनीति और सत्ता को बड़ा नुकसान हो सकता है। इसलिए प्रचंड सरकार ने संसद में महाभियोग प्रस्ताव लाकर उन्हें पद से हटाने की कोशिश की। महाभियोग प्रस्ताव आने के बाद सैकड़ों छात्र, महिलाएं और आम लोग काठमांडू की सड़कों पर उतर आए। सुप्रीम कोर्ट ने भी एक ऐतिहासिक आदेश देकर कहा कि जब तक महाभियोग की सुनवाई पूरी नहीं होती, तब तक सुशीला कार्की को काम करने से नहीं रोका जा सकता। जून 2017 में उनके रिटायरमेंट से सिर्फ एक दिन पहले संसद ने महाभियोग प्रस्ताव वापस ले लिया। चीफ जस्टिस बनने से पहले भी वह अपने फैसलों से जनता के बीच लोकप्रिय हो चुकीं थीं। उन्होंने नेपाल में सरोगेसी को बिजनेस बनने से रोका था। साल 2015 में नेपाल सुप्रीम कोर्ट ने सरोगेसी (किराए की कोख) पर अहम फैसला दिया था। उस समय जस्टिस सुशीला कार्की की बेंच ने कहा कि सरोगेसी को बिजनेस नहीं बनने दिया जा सकता, इससे गरीब महिलाओं का शोषण हो रहा है। अदालत ने तुरंत प्रभाव से सरोगेसी पर रोक लगा दी। यह कदम इसलिए अहम था, क्योंकि भारत में बैन के बाद विदेशी कपल नेपाल आकर सरोगेसी करा रहे थे। फैसले के बाद नेपाल सरोगेसी टूरिज्म का गढ़ बनने से बच गया। बाद में सरकार को इस लेकर कानून बनाने की जिम्मेदारी सौंपी गई।
नेपाल में युवा विद्रोह का वैश्विक असर, भारत के लिए बना चिंता का विषय- नेपाल में अशांति भारत के लिए सीधी चिंता का विषय है। दोनों देशों की 1,700 किमी लंबी खुली सीमा है, जहां रोज़ लाखों लोग आवाजाही करते हैं। विद्रोह और हिंसा से उत्पन्न अस्थिरता का असर बिहार, उत्तर प्रदेश और सिक्किम तक पड़ सकता है। भारत को डर है कि शरणार्थियों की लहर न आ जाए और सीमाई सुरक्षा चुनौतीपूर्ण न हो जाए।



