कहीं दूर एकांतवास चलते हैं
यहाँ कर्कश स्वर बहुत चुभते हैं
शांत स्वच्छ परिवेश होगा
निज देश में स्वप्न कुछ बुनते हैं
कोयल के मधुर गीत गुंजित होंगे
कोलाहल रहित निर्जन वन में
पक्षियों का करलव निनाद स्वर
प्रणय का मधुर संगीत रचेंगे
न होगा कपटी जन अरु मन
न आएगा बीच मीत-प्रीत कोई
सेवा भक्ति से मैं पूजा करूँगा प्रिये
न रह जाएगी हार जीत कोई
निज ही होगा राज्य हमारा
राजी काजी भी होंगे सभी
सत्ता सदा हाथों में हमारे
जहाँ न होगा दोषी कोई
मैं नृप नृजन हो जाऊँगा
तुम वन सृजन हो जाना
बहाना तुम प्रेम की धारा
श्वास से श्वास प्यास बुझाना
झुलसती भू घाम तप्त हो अगर
स्थिर घनघोर तरु मैं हो जाऊँगा
प्रतिच्छण प्रेमालाप निजालय
तुम संग प्रेम की धार बहाउंगा
धनेश द्विवेद्वी “रिसर्च स्कॉलर”
हे० न० ब० ग० वि० (केंद्रीय विश्वविद्यालय) एस. आर. टी. परिसर, टिहरी गढ़वाल, उत्तराखण्ड,
ग्राम-थापला, संगलाकोटी, पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखण्ड,
dhaneshdwivedi494@gmail.com



