यादों के झरोखे से हवा में बहता
एक किस्सा l
जिसमे पिताजी जो आ रहे थे
दूर से कमा कर
बहुत दिनों बाद घर वापस ll
हाथ मे छोटा सा संदूक लिये
जिसमे होते थे कुछ कपडे
और महक चने मुरमुरे की
जो बिखरे थे सारे संदूक मे
जैसे खुशियाँ बिखरी है आज
घर मे ll
थोडा सा हिलाने पर खनखना रहा था
मानों बच्चों की छेडकानी का इतजार
कर रह हो
बताने के लिये की
पिताजी के बक्से मे तुम्हारे
लिये ढेर सारी खुशियाँ है ll
और जब खुला तो बिखेर दी
उसने खुशियों की महक और
मुस्कान के मोती सबके चेहरों पर ll
और सम्पूर्ण हुआ पिता का संघर्ष
जिसमे मुरमुरे की खुशबु के साथ
है खुशबु उनके खून पसीने की भी
जिससे खुश हुआ था उनका मन
की कमायी मैने खुशियाँ
बस थोडे से खून और पसीने की कीमत
चुकाकर अपने परिवार के लिये ll
अनीता चमोली
देहरादून उत्तराखंड



