करोड़ों खर्च के बावजूद जमीनी हकीकत उलट, छात्रविहीन हो रहे पहाड़ी स्कूल
स्कूल बंद होने से भोजन माता हुई बेरोजगार
नारायणबगड़/पर्वतीय क्षेत्र। उत्तराखंड सरकार एक ओर प्रदेश को ‘एजुकेशन हब’ बनाने के बड़े-बड़े दावे कर रही है और शिक्षा के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर पहाड़ों की जमीनी हकीकत इन दावों की पोल खोल रही है। राज्य के दूरस्थ पर्वतीय इलाकों में लगातार स्कूल बंद होने की खबरें सामने आ रही हैं, जो न सिर्फ शिक्षा व्यवस्था बल्कि सरकारी नीतियों की प्रभावशीलता पर भी गंभीर सवाल खड़े कर रही हैं।पर्वतीय क्षेत्रों में छात्र संख्या तेजी से घट रही है। कई विद्यालयों में छात्रों की संख्या शून्य तक पहुंच चुकी है, जिसके चलते उन्हें बंद करना पड़ रहा है। हाल ही में चमोली जिले के नारायणबगड़ ब्लॉक के कोथरा गांव का राजकीय प्राथमिक विद्यालय इसका ताजा उदाहरण है, जहां छात्र न होने के कारण स्कूल बंद हो गया। ऐसे कई मामले प्रदेश के अन्य जिलों से भी सामने आ रहे हैं।विशेषज्ञों और स्थानीय लोगों का मानना है कि शिक्षा व्यवस्था के कमजोर होने का सबसे बड़ा कारण पहाड़ों से लगातार हो रहा पलायन है। रोजगार, स्वास्थ्य और बेहतर शिक्षा की तलाश में लोग गांव छोड़कर शहरों की ओर जा रहे हैं। परिणामस्वरूप गांव खाली हो रहे हैं और स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की संख्या लगातार घटती जा रही है। यह एक ऐसा दुष्चक्र बन गया है, जहां सुविधाओं के अभाव में लोग पलायन कर रहे हैं और पलायन के कारण बची-खुची सुविधाएं भी खत्म हो रही हैं।सरकार द्वारा शिक्षा के क्षेत्र में बजट बढ़ाने और योजनाएं चलाने के बावजूद उनका लाभ जमीनी स्तर तक नहीं पहुंच पा रहा है। कई स्थानों पर शिक्षकों की कमी, बुनियादी सुविधाओं का अभाव और निगरानी तंत्र की कमजोरी भी स्थिति को और बिगाड़ रही है। सवाल यह भी उठ रहा है कि जब सरकार की नीतियां और योजनाएं लागू हो रही हैं, तो फिर उनका असर पहाड़ों में क्यों नहीं दिख रहा?स्थानीय जनप्रतिनिधि और सामाजिक कार्यकर्ता भी इस मुद्दे को लेकर सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठा रहे हैं। उनका कहना है कि सरकार के दावे और हकीकत के बीच बड़ा अंतर है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यदि समय रहते इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले समय में पहाड़ों की शिक्षा व्यवस्था पूरी तरह चरमरा सकती है।अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर उत्तराखंड की शिक्षा व्यवस्था कब पटरी पर आएगी? क्या सरकार पहाड़ों में शिक्षा को बचाने और पलायन रोकने के लिए कोई ठोस और प्रभावी नीति बनाएगी, या फिर ‘एजुकेशन हब’ के दावे सिर्फ कागजों तक ही सीमित रह जाएंगे? यह सवाल आज हर उस व्यक्ति के मन में है, जो प्रदेश के भविष्य को लेकर चिंतित है।



