मन के द्वंद्व की रणभूमि पर,
. द्वंद हमें भरमाता है ll
खुद ही खुद से लड़ता है जब
.जीत नहीं मन पता है ll
युद्ध मन का होता विचित्र
शत्रु पहचान न पाता हैll
मन ही हमको उलझाता है,
मन ही हमको डराता है ll
बाहरी युद्ध तो जीत जाते,
अंतर्मन युद्ध हराता है ll
मन माया में जब भी फसता,
विलुप्त विवेक हो जाता है ll
जब करते प्यार छलावे से
तो मन शत्रु बन जाता है ll
मायावी मन छलिया विवेक,
अधर्म की राह दिखाता है ll
सत पथ से कर विमुख हमें,
माया पथ पर भटकाता है ll
बिन पेंदे के लोटा सा मन,
अक्सर हमको भटकाता है ll
धर्म युद्ध करता है जो,
कृष्ण को सारथी पाता है ll
युद्ध जो लड़ता अर्जुन बन,
वही विजयश्री पाता है ll
अनीता चमोली
उत्तराखंड देहरादून



