क़लम जब भी उठी हमारी
हमने ऐसा कुछ खास लिखा
अंधियारे में जो ग़ुम हो गए
उनका सुंदर इतिहास लिखा
शौर्य, बलिदान भूल न जाएं
ऐसा उन पर गीत लिखा
मूक क़लम के ऊँचे गंुंजन से
क्रांति का नव संगीत लिखा
बिक गई जब राजनीति हमारी
संकट में हमें तब देश दिखा
जाती पाती का भेद भुलाकर
संविधान फिर एक लिखा
जब-जब आएगा संकट देश पर
हम अपनी कलम चलाएंगे
सैनिक जब लड़ेंगे शस्त्र से
हम कलम को तलवार बनाएंगे।




