माँ गंगा से व्यथा-विनती
द्रवित हृदय निज व्यथा सुनाती,
जाकर गंगा सम्मुख दुख जताती।
उठता प्रलय का ज्वार ह्रदय में
कल-कल छल-छल नाद शांत कराती।
पतित-पावनी हृदय छिद्रित
नवनिर्मित होता जब तेरे दर्शन पाती।
सब जगह से थक हार गई,
हे दुखहारणी व्यथा अब तुझे सुनाती।
दु:ख में सब सुध विस्मृत जब,
अंजली भरकर मुख पर हूँ मारती।
तूने ही सगर पुत्रों का उद्धार किया
भगीरथ के पूजा फूलों को स्वीकार किया।
फूट फूट स्वत: झरित अश्रुकुशुम,
मैं तो अभागन नित तेरे दर पर हूँ चढ़ाती।
ममता-मयी, नवनीत-हृदय माँ,
खिन्नमन ह्रदय लेकर नित हूँ तेरे पास आती।।
धनेश्वर द्विवेदी



