न्याय पाने की आस में
सत्य की तलाश में
उम्र बीत रही है देखो
न्याय के दरबार में
पूजते हैं जिस देवी को
उलझी है सच और झूठ मे
सच को दबाकर सबूत थमाये है
झूठों के सरदार ने
कैसे होगा इंसाफ
सुनेगा कौन उस सत्य को
दब गया है जो
वकीलों की दलील में
पैरवी करते हैं जो सत्य की
बिक जाते हैं कभी-कभी
घर जमीन बेच कर. भी
पीड़ित की आस
तोड़ देती है. जब सांस
एक उम्र की दहलीज पर
उलझा रहता है सत्य
कब कहां क्यों कैसे
जैसे प्रश्नों से
काले कोट और श्वेत कमीज पर
तारीखे चलती है
न्यायाधीश बदलते हैं
सत्य गूंजता. है
जब अटल होकर न्याय के मंदिर में
टकराता है झूठ से
होता है फैसला
होती है जीत सत्य की
लेकिन पीड़ित कभी-कभी
शामिल नहीं हो पता
जीत के इस जश्न में
तब तड़पते हुए पूछती है रूह
क्यों हुई देर मेरे इंसाफ में
पर सुकून है उसे
देर से ही सही
हुई है जीत सत्य की
सदा जय हो सत्य की
न्याय के दरबार में
अनीता चमोली
उत्तराखंड देहरादून



