मै पत्थर हूँ
मैं पत्थर हूं
अपनों के संग
ऐसे प्रीत निभाता हूं
नींव से लेकर ऊंचे भवन तक
बालू,सीमेंट मे मिल जाता हू
कठोरता से कुरूप इतना हूँ
हृदय न किसी के भाता हूं
लीँपाई पुताई की दीवारो के पीछे
मैं खुद ही छिप जाता हूं
मैं पत्थर हूं
अपनों के संग
ऐसे प्रीत निभाता हूं
चल ना सको गर पथरीली राहों में
चोट सह के कंकर बन जाता हूंँ
घाव न दे मेरा कंकर तुमको
तब राहे मिट्टी मे दब जाता हूँ
मैं पत्थर हूं अपनों के संग
ऐसे प्रीत निभाता हूं
वेग नदिया का पार
कर ना पाओ तो मैं सेतु बन जाता हूं
बढो अपनी मंजिल की तरफ
तब चरणों में बिछ जाता हूं
लहरे घेरे न बीच राह में
दरिया से भी लड़ जाता हूं
मैं पत्थर हूं अपनों के संग
ऐसे प्रीत निभाता हूं
मंदिर में ईश्वरीय रूप में
मैं ही तराशा जाता हूं
बारंबार चोट खाकर
सृजन कर्ता से ईश्वरीय रूप को पाता हूं
आंखों से छलकती वेदना तेरी
और मन की पीड पढ जाता हूं
अपनी एक मुस्कान से फिर
तुझ में आत्मविश्वास जगाता हूं
अकेला नहीं तू इस संघर्ष में
तुझे ये एहसास दिलाता हूं
मैं पत्थर हूं अपनों के संग
ऐसे प्रीत निभाता हू



