
जब राधा ने कृष्ण को देखा,
आँखें बंद , पर हृदय दीप्त था।
प्रेम संज्ञा नहीं, वो तो
श्वास की अंतिम बौध था।
उद्धव ने ग्रंथ खोले,
श्लोकों में सत्य खोजा,
पर गोकुल की गोपियाँ
निशब्द भाव में डूबी थीं,मौन ही उनका बोध था।
प्रेम अंधा है, उद्धव बोले,
राधा हँसी, कहा, “तो दृष्टि किसकी?”
तुमने ज्ञान की बात की,
पर क्या कभी प्रीत की पीर सीखी?”
कृष्ण ने जब मुरली रख दी,
और गीता थमा दी जग को,
तब भी राधा वहीं थी,
जहाँ राग अधूरा था
क्योंकि प्रेम कभी पूर्ण नहीं होता,
वो तो अनंत में भी अपूर्णता का स्वाद रखता है।
ज्ञान कहता है “मैं जानता हूँ”,
प्रेम कहता है “मैं मिटता हूँ।”
ज्ञान समझाता है
प्रेम बस सह जाता है।
तो कहो उद्धव!
क्या तुम्हारे पास वो मौन है,
जो एक बंसी की तान में
राधा को समा गया?
प्रेम और बोध के बीच,
एक पुल है जो शब्दों से नहीं,
त्याग और समर्पण से बना है।
जहाँ राधा बैठी है, और उद्धव ठहरा है,
दोनों अपने अपने सत्य में,
पर एक ही कृष्ण की खोज में।
धनेश द्विवेदी
ग्राम-थापला, सांगलाकोटी, पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखण्ड



