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हर स्त्री की तरह वो भी कोमल है
लेकिन उसकी दृढता उसको
बनाती है मजबूत
वो श्रृंगार नही करती उसे मेहनत से निकले पसीने की
महक ही अब भाती है ll
उसके कपडे धुले तो है लेकिन
कई जगह से सिले हुए है
जैसे जीवन की कठीनाइयों को
दे रही हो खुशियाँ भी चुनौती
नंगे पाव ही घूमते हुए करती
है हर काम ढाक के अपनी मर्यादा चुनरी से जो जरूरी है उसके लिये पैरों की
सुविधा जनक चप्पल से ज्यादा
वो खुद को सजाने के लिये ll
शरीर से कुरूप दिखकर भी करती है श्रृंगार खुद में समाये गुणों का
वो मां है उसे कोई हरा नही सकता वो बनी एक विश्व विजेता अपने
परिवार के संघर्षो के लिये
जिसमें लडती है वो समाज मे घूरती
नजरों से और रूढीवादी परंपराओं से
सिर्फ अपने बच्चों के सुखद भविष्य के लिये ll
उत्तराखंड ( देहरादून )



