जग की जननी, दुर्गा माता,
संकट हरती धानी,
अंधियारे में दीप बनी तू,
तू ही सुख की रानी।
करुणा की तू मूर्ति विशाल,
आँचल में संसार,
जब अत्याचार बढ़े,
तब फूटता है क्रोध का ज्वार।
शिव के सम चित धैर्य धरे जो,
भैरव सम रौद्र भरे जो,
कर में खप्पर, रक्त पिपासिनि,
चरणों में भय डरे जो।
भाल चमकता ज्वाला जैसा,
नयनों में अंगार,
महिषासुर तक काँप उठा था,
सुन तेरा हुंकार।
तू काली, चंडी, अन्नपूर्णा,
तू सृष्टि की धार,
तू ही सृजन, तू ही संहारिणि,
तू ही शाश्वत सार।
जब-जब भू पर पाप बढ़ा है,
तूने लिया अवतार,
चीर अंधेरा, रौद्र रूप धर,
किया विनाशाचार।
सिंह सवारी, त्रिशूलधारिणि,
रण में अडिग खड़ी,
तेरे सम्मुख क्या टिक पाए,
दैत्यों की भी भीड़ बड़ी?
खप्पर में तू पाप समेटे,
भस्म करे अभिमान,
तेरे रौद्र नयन से काँपे,
त्रिभुवन का विधान।
माँ, हम सब के दुःख हरनी,
भक्तों की रखवाली,
शरण तुम्हारी माँ शेरोवाली,
जग की तू रखवाली।
धनेश द्विवेद्वी ( रिसर्च स्कॉलर, हे०न०ब०ग० केंद्रीय विश्वविद्यालय)
ग्राम-थापला, संगलाकोटी, पौड़ी गढ़वाल
उत्तराखण्ड ,
dhaneshdwivedi494@gmail.com



