थक न मुसाफिर चलते चलते
अपने सफर पर चलता चल
मंजिल है दूर लेकिन तू
अपनी राहे तय करता चल
निकलेगा मंजिल की तरफ
राहों में कांटे आएंगे
सच का साथ देगा यदि तो
झूठे पत्थर बरसाएंगे
छोड़ना मत शौर्य अपना
ये गीता का उपदेश है
मांगने से दिये ना पांच गांव
ये ऐसे कौरवौ का भी देश है
पग पग पर लडना वीरता से
अधिकार फिर अपना पाना तू
डंका बजा पहले अपने शौर्य का
तब कृष्ण को शीश झुकाना तू
राम को भी सागर से यहाँ
मौन रहकर कहां राह मिली
धनुष ताना जब रघुवंशी ने
अहंकारी समुद्र की तब जड़े हिली
तू भी लड़ जहां पर तुझको
लड़ना धर्म है दिख रहा
देख इस जहां में कैसे
झूठ सच के रूप में बिक रहा
गीता की राह पर चल मुसाफिर
अंधे धर्म के लिए.न लड़ यहां
दिखेगी इंसानियत जहां
तुझको तब
एक पल तू रुक जाना वहां
लडना अकेला सत के लिए
ये वीर की पहचान है
देने पड़ेंगे इस युद्ध में फिर
तुझको कई बलिदान है
जीत गया युद्ध में यदि तू
जग में सम्मान पाएगा
कट जाये यदि शीश लडते लडते
तब पराक्रम तेरा पूजा जाएगा
देहरादून, उत्तराखंड




