पुराना साल
चुपचाप अपने जूते उतार रहा है
मेरे आँगन में,
उसके कपड़ों में
अब भी तुम्हारी हँसी की ऊष्मा बसी है।
इस साल ने
मुझे तुम्हारा इंतज़ार करना नहीं,
तुम्हारी उपस्थिति को
अपने भीतर सँजोना सिखाया।
और यह भी
कि हर अधूरापन
कमी नहीं होता,
कुछ अधूरेपन
मनुष्य को
और मनुष्य बना देते हैं।
मैंने
कई साँसे
तुम्हारे नाम लिखीं,
और कई रातें
तुम्हारे बिना भी
खुद के साथ
जीना सीखते हुए
थोड़ा और मजबूत हो गया।
नया साल
द्वार पर खड़ा है,
उसकी आँखों में
भविष्य की कोमल रोशनी है।
वह मुझसे पूछता है
क्या अब भी
तुम्हें साथ लेकर चलूँ?
मैंने कहा
हाँ,
पर बोझ की तरह नहीं,
प्रेरणा की तरह।
ऐसी स्मृति की तरह
जो चुभे नहीं,
बस यह याद दिलाए
कि प्रेम
मनुष्य को बड़ा करता है।
यदि कभी
इस नए साल की किसी सुबह
तुम मेरी स्मृति बनकर आ जाओ,
तो घबराना मत
मैं तुम्हें थामूँगा नहीं,
बस मुस्कुराकर
कृतज्ञता से
स्वीकार कर लूँगा।
क्योंकि
अब मैं समझ गया हूँ
हर साल
सब कुछ साथ नहीं लाता,
कुछ अनुभव
हृदय में छोड़ जाता है,
ताकि हम
आने वाले कल से
डरें नहीं,
बल्कि
विश्वास के साथ
उसकी ओर बढ़ें।
धनेश द्विवेदी
रिसर्च स्कॉलर,
वर्तमान- हेमवती नन्दन बहुगुणा केंद्रीय विश्वविद्यालय, स्वामी रामतीर्थ परिसर, टिहरी गढ़वाल, उत्तराखंड,
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