जिम्मेदारियों की डोर से
बंधी यह जीवन की पतंग
उड़ती है विचारों के
खुले आसमान में
खुशियों और उमंगों को
समेटे अपने आप में
तीज त्यौहारों के हिंडोले में
झूलती धीमें-धीमें
ढ़ील देते हुए जैसे अपनों के
प्रेम के आनंद मंे मुस्करा रही हांे
यह सभी को पता है
धरती पर पड़ी
कटी पतंग का नहीं कोई
आसमां होता है?
इसीलिए मजबूत डोर से
रिश्तों को बांधना कितना
कितना ज़रूरी है।



