मानव ईश्वर की सुन्दर और सर्वोच्चतम रचना है। जिसके प्रत्येक भाव को ईश्वर ने कहीं न कहीं प्रकृति से जोडा है; चुंकि वह प्रकृति का ही अंग है। प्रकृति की विकृति सृष्टि में व्याप्त प्रकाश व अंधकार हमारे अंत: करण पर विशेष प्रभाव डालता है। वह पंचमहाभूतों के रूप में हो या भावरुप में हो, एवं आत्मीयता के आधार पर प्रकाश को हम सदैव जीवन में खुशियों और सफलताओं के रुप में मानते हैं।
अंधकार के अंधेरा, तिमिर आदि अनेक पर्याय हैं। अंधकार को नकारात्मकता एवं अज्ञान अर्थ में प्रयोग मे लाया जाता है। इससे हम कहीं न कहीं खुद को अलग रखने की कोशिश करते हैं; किन्तु प्रकाश की भांति अन्धकार भी ईश्वरीय रचित प्रकृति का अंग है, जो हमें अंतः करण में अकेलेपन के रूप मे महसूस होता है। लेकिन सभी प्रकाश की महिमा मंडन करते नहीं थकते एवं अंधकार को (दु: ख के रूप में ) कोसते है तो क्या अकेलापन (अंधकार )हमारे जीवन के लिए श्राप है? , क्या प्रकाश ही सब कुछ है ? नहीं। क्योंकि जब हम जीवन में खुशियां और सफलताओं को बटोरते हुए आगे बढने की कोशिश करते हैं तब कभी-कभी हम बाहरी भीड-भाड और दुनियां की चकाचौंध भरे प्रकाश में भी अपनी सही राह को भूल जाते हैं। अपने लक्ष्य से भटक जाते हैं। तब भटकी हुई राहें हमें दर्द और अनगिनत तकलीफें देती है। जिसके कारण हम भीड़ में भी अकेलापन को महसूस करते हैं। खुद को उसमें लीन कर लेते हैं। किन्तु हम ये भूल जाते हैं की, अकेलेपन का ये अन्धकार भी ईश्वर की ही रचना का एक हिस्सा है। तो ये हमें असहाय कैसे बना सकता है, ये वो एक समय होता है, जब हम उस अन्धकार में खुद को दूढने की कोशिश करते हैं। यही अन्धकार हमें हमारे अस्तित्व के प्रकाश के दर्शन करता है। अकेलेपन की अन्धकारमयी ऊर्जा ही हमें बहारी भीड़ से हटाकर हमें हमारे आंतरिक गुणों से मिला कर हम में एक नई विश्वास रूपी ज्योति को प्रज्वल्लित करता है। हम एक बार फिर जीवन की प्रकाशमयी ऊर्जा की और अग्रसर होते हैं।
जीवन की चकाचोंध से जब हम कहीं खो जाते हैं।
तमस रूपी ज्योति में डूबकर, फिर खुद से मिल पाते हैं।।
“अनीता चमोली”
देहरादून (उत्तराखंड )



