पिछले दो दशकों से विभिन्न स्थानों, विशेष रूप से भारत में शिक्षा क्षेत्र में काम करते हुए मैंने यह देखा है कि नेतृत्व के शीर्ष पदों पर अभी भी पुरुषों का दबदबा है। क्या दुनिया आज भी सशक्त महिला नेतृत्व तैयार करने में असमर्थ है?
इस पर विचार करते समय, मेरे सामने कुछ चौंकाने वाले आंकड़े आए: वैश्विक स्तर पर उच्च शिक्षा के नेतृत्व में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बहुत कम है। हालांकि 45% उच्च शिक्षा फैकल्टी महिलाएं हैं, लेकिन नेतृत्व के पदों पर केवल 30% ही पहुंच पाती हैं। (स्रोत: टाइम्स ऑफ इंडिया, जून 2025)
यूनेस्को (UNESCO) की ‘लीड फॉर लर्निंग’ रिपोर्ट (2024-25) के अनुसार, शिक्षा में महिला नेतृत्व की कमी एक गंभीर चिंता का विषय है। अधिकांश शिक्षक महिलाएं हैं, लेकिन नेतृत्व करने वाली बहुत कम हैं, जो एक वैश्विक असमानता को दर्शाता है। यह केवल नारीवाद (Feminism) नहीं है, बल्कि यह ‘संज्ञानात्मक विविधता’ (Cognitive Diversity) की खोज है।
भारतीय संदर्भ और ऐतिहासिक गौरव
अगर मैं विशेष रूप से भारत की बात करूं, तो हम उस भूमि से आते हैं जहां महिलाओं ने ऐतिहासिक नायिकाओं की भूमिका निभाई है। भारतीय महिलाओं ने “नेतृत्व” को सहानुभूति, लचीलेपन और अटूट उत्कृष्टता के मिश्रण के रूप में परिभाषित किया है। चाहे वह:
* रानी लक्ष्मीबाई की ऐतिहासिक वीरता हो,
* इंदिरा गांधी और सुषमा स्वराज का राजनीतिक दृढ़ संकल्प हो,
* इंद्रा नूयी जैसी कॉर्पोरेट जगत की दिग्गज हों,
* या सावित्रीबाई फुले जैसी शैक्षणिक क्रांति की अग्रदूत।
इनमें से प्रत्येक ने नेतृत्व पर एक अनूठा दृष्टिकोण दिया है जिसे वास्तविक दुनिया में अपनाया जाना चाहिए।
चाहे वह वैश्विक साझेदारी हो, सरकार हो, उच्च शिक्षा हो, या एआई (AI) और डेटा का एड-टेक में एकीकरण हो—हर उद्योग में एक मजबूत स्वतंत्र महिला और उसकी टीम की सफलता की कहानियां मौजूद हैं।
सबसे अच्छी बात महिलाओं के नेतृत्व वाले उद्यमों में मजबूत EQ (भावनात्मक गुणांक) की उपस्थिति है। वे न केवल खुद आगे बढ़ती हैं, बल्कि दुनिया को भी अपने साथ आगे ले जाती हैं, क्योंकि वे इसे अपनी भावनात्मक, नैतिक, सामाजिक और व्यावसायिक जिम्मेदारी मानती हैं।
जैसा कि मैं हमेशा कहती हूँ:
“ अपने मनचाहे करियर में पहचान बनाने के लिए: विचारवान लड़की, व्यवहार कुशल महिला और शालीन लेडी बनें।”
डॉ. नेहा चोकसी
प्रोफेसर , देव भूमि उत्तराखंड यूनिवर्सिटी , देहरादून



