अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष
देवभूमि उत्तराखंड की पहचान केवल हिमालय की ऊंची चोटियों, पवित्र नदियों और आध्यात्मिक धरोहरों से ही नहीं है, बल्कि यह भूमि उन वीरांगनाओं, समाज सुधारकों, साहित्यकारों, शिक्षाविदों और आंदोलनकारियों की भी रही है, जिन्होंने समय-समय पर साहस, त्याग और नेतृत्व का अद्भुत परिचय दिया।
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर उत्तराखंड की उन प्रेरणादायी महिलाओं को याद करना आवश्यक है, जिनकी गाथाएं आज भी समाज को नई दिशा देती हैं।
उत्तराखंड राज्य के इतिहास में अनेक महान महिलाएं हुई हैं, जिनका योगदान समाज के लिए आज भी प्रेरणादायक है। देश की आजादी से लेकर राज्य निर्माण तक यहां की महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
उत्तराखंड की प्रेरणादायी महिलाएं
महारानी कर्णावती (नाक काटी रानी)
गढ़वाल की वीरता का प्रतीक महारानी कर्णावती का नाम इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। 17वीं शताब्दी में जब मुगल सेना ने गढ़वाल पर आक्रमण किया, तब महारानी कर्णावती ने असाधारण साहस और रणनीति का परिचय दिया। उन्होंने शत्रुओं को पराजित कर बंदी बनाए गए सैनिकों की नाक कटवाकर वापस भेजा। इसी ऐतिहासिक घटना के कारण उन्हें “नाक काटी रानी” कहा गया।
तीलू रौतेली
उत्तराखंड की वीरांगनाओं में तीलू रौतेली का नाम विशेष रूप से लिया जाता है। किशोरावस्था में ही पिता और भाइयों की शहादत के बाद उन्होंने शस्त्र उठाया और कई युद्धों में विजय प्राप्त की। मात्र 15 वर्ष की आयु में रणभूमि में उतरने वाली तीलू रौतेली आज भी साहस की मिसाल मानी जाती हैं। उनके सम्मान में ‘तीलू रौतेली पुरस्कार’ दिया जाता है।
ठगुली देवी (टिंचरी माई)
सामाजिक जागरूकता और जनआंदोलन के क्षेत्र में ठगुली देवी, जिन्हें टिंचरी माई के नाम से जाना जाता है, का योगदान महत्वपूर्ण है। उन्होंने पहाड़ों में शराबबंदी आंदोलन का नेतृत्व कर ग्रामीण महिलाओं को संगठित किया।
गौरा देवी (चिपको वूमन)
पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में गौरा देवी का नाम विश्वभर में प्रसिद्ध है। 1970 के दशक में जब जंगलों की कटाई का खतरा बढ़ा, तब उन्होंने ग्रामीण महिलाओं के साथ पेड़ों से चिपककर जंगलों की रक्षा की। यह आंदोलन आगे चलकर चिपको आंदोलन के रूप में विश्वभर में प्रसिद्ध हुआ।
राधा बहन
कौसानी स्थित नारायण आश्रम से जुड़ी राधा बहन ने पहाड़ की महिलाओं को शिक्षा और आत्मनिर्भरता की राह दिखाई। उन्होंने शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बनाकर ग्रामीण समाज में नई चेतना जगाई।
सरला बहन (कैथरीन हाइलमैन)
ब्रिटिश मूल की कैथरीन हाइलमैन, जिन्हें सरला बहन के नाम से जाना जाता है, ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई और महिलाओं में जागरूकता फैलाने का कार्य किया।
बिसनी देवी शाह
बागेश्वर की रहने वाली बिसनी देवी शाह स्वतंत्रता संग्राम में जेल जाने वाली उत्तराखंड की पहली महिला थीं। उनका साहस प्रदेश के स्वतंत्रता इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान रखता है।
आयरन पंत
कुमाऊं मूल की बेगम राणा लियाकत अली खान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित महिला थीं। वे पाकिस्तान की पहली महिला गवर्नर और राजदूत बनीं। संयुक्त राष्ट्र ने उन्हें मानवाधिकारों के क्षेत्र में सम्मानित किया और उन्हें “वुमन ऑफ पाकिस्तान” तथा “वुमन ऑफ द वर्ल्ड” जैसे सम्मान भी मिले।
हंसा मनराल
खेल जगत में हंसा मनराल ने इतिहास रचा। वे उत्तराखंड की पहली महिला थीं जिन्हें द्रोणाचार्य पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
प्रोफेसर सुशीला डोभाल
शिक्षा प्रशासन में प्रो. सुशीला डोभाल का महत्वपूर्ण योगदान रहा। वे गढ़वाल विश्वविद्यालय की पहली महिला कुलपति बनीं और शिक्षा क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किए।
सुभाषिनी बर्त्वाल
उत्तराखंड राज्य आंदोलन में सुभाषिनी बर्त्वाल का नाम विशेष रूप से लिया जाता है। 1994 के मसूरी गोलीकांड प्रकरण में उन्हें सीबीआई जांच का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने आंदोलन की भावना को कमजोर नहीं होने दिया।
गौरा पंत ‘शिवानी’
हिंदी साहित्य की प्रसिद्ध लेखिका गौरा पंत ‘शिवानी’ ने अपने उपन्यासों और कहानियों से साहित्य जगत को समृद्ध किया। उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया।
मृणाल पांडे
मृणाल पांडे पत्रकारिता और साहित्य दोनों क्षेत्रों में प्रतिष्ठित नाम हैं। वे हिंदी मीडिया जगत की अग्रणी हस्तियों में गिनी जाती हैं।
कमलेन्दुमती शाह
टिहरी की महारानी और सांसद के रूप में कमलेन्दुमती शाह ने समाज सेवा और राजनीति में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्हें 1958 में पद्म भूषणसे सम्मानित किया गया।
बेलमती चौहान और हंसा धनई
उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलन के दौरान 2 सितंबर 1994 को मसूरी गोलीकांड में बेलमती चौहान और हंसा धनई जैसी महिलाओं ने सर्वोच्च बलिदान दिया। उनका बलिदान राज्य निर्माण के संघर्ष की अमिट याद है।
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस केवल उत्सव का अवसर नहीं है, बल्कि उन महिलाओं के संघर्ष, समर्पण और नेतृत्व को याद करने का दिन है, जिन्होंने समाज को नई दिशा दी।
उत्तराखंड की ये महिलाएं हमें बताती हैं कि चाहे युद्धभूमि हो, पर्यावरण संरक्षण का आंदोलन, शिक्षा, साहित्य या राजनीति—हर क्षेत्र में महिलाओं ने अपनी क्षमता और प्रतिबद्धता का परिचय दिया है।
देवभूमि की ये वीरांगनाएं आज भी समाज के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं। उनका जीवन संदेश देता है कि साहस, शिक्षा, सामाजिक चेतना और आत्मविश्वास के बल पर कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं।
डॉ. अनिल चंदोला
सेवानिवृत्त अपर निदेशक, सूचना
देहरादून



