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Home » उत्तराखंड की बेटी नीतू उर्फ निहारिका सती बनी लोक संस्कृति की आवाज
उत्तराखण्ड

उत्तराखंड की बेटी नीतू उर्फ निहारिका सती बनी लोक संस्कृति की आवाज

Pahad ki KhabarBy Pahad ki KhabarJune 21, 2026No Comments
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अपनी सुरीली गायकी से बचा रही विलुप्त होती जागर और मांगल की परंपरा

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नंदानगर। देवभूमि (उत्तराखंड)। उत्तराखंड की धरती सिर्फ पहाड़ों और नदियों की भूमि नहीं है, यह साक्षात देवताओं का वास है। लेकिन जरा सोचिए, अगर इस देवभूमि से देवी-देवताओं का आह्वान करने वाली सदियों पुरानी आवाजें ही खामोश हो जाएं, तो क्या होगा? समय के क्रूर थपेड़ों के बीच जब उत्तराखंड की लोक संस्कृति, मांगल गीत और जागर जैसी अमूल्य विधाएं विलुप्त होने की कगार पर खड़ी थीं, तब चमोली जिले के नंदानगर की एक बेटी ने इस विलुप्त होती संस्कृति को बचाने का बीड़ा उठाया। इस जांबाज और सुरीली लोकगायिका का नाम है नीतू उर्फ निहारिका सती।जो नंदानगर कुरूड निवासी नीतू उर्फ निहारिका ने उस रूढ़िवादी दीवार को ढहा दिया, जहां ‘जागर’ विधा पर केवल पुरुषों का एकाधिकार माना जाता था। उन्होंने इस परंपरा को तोड़ा, अपनी कोमल और सुरीली आवाज में देवताओं का आह्वान किया और समाज को इस प्राचीन कला से जोड़ा। लेकिन अफ़सोस! संस्कृति की इस रक्षक बेटी को समाज और व्यवस्था से जो सम्मान मिलना चाहिए था, उसकी जगह शुरुआत में उन्हें मिला सिर्फ मजाक और उपेक्षा। पिछले 10 वर्षों से वह लगातार संघर्ष कर रही हैं, लेकिन आज तक उन्हें न तो कोई बड़ा सरकारी मंच मिला और न ही वह सराहना, जिसकी वह हकदार हैं। यह खबर केवल एक लोकगायिका की कहानी नहीं है, बल्कि यह हर उस सनातनी और उत्तराखंडी के जमीर को झकझोरने वाली पुकार है, जो अपनी जड़ों को भूलता जा रहा है।

पुरुष प्रधान परंपरा में बनाई अपनी अलग पहचान

एक समय ऐसा था जब जागर गायन को मुख्य रूप से पुरुषों तक सीमित माना जाता था। समाज में महिलाओं की भागीदारी बहुत कम थी। ऐसे दौर में निहारिका शती ने परंपरागत सीमाओं को तोड़ते हुए इस क्षेत्र में कदम रखा और अपनी प्रतिभा से अलग पहचान बनाई।आज वे उत्तराखंड के गांवों से लेकर विभिन्न राज्यों के मंचों, सांस्कृतिक आयोजनों और विश्वविद्यालयों तक जागर और मांगल की परंपरा को पहुंचाने का कार्य कर रही हैं। उनके प्रयासों से अनेक युवाओं को अपनी संस्कृति को समझने और उससे जुड़ने की प्रेरणा मिल रही है।

क्या हैं मांगल गीत?

उत्तराखंड के मांगल गीत केवल संगीत नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा और सामाजिक जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं। विवाह, नामकरण संस्कार और अन्य शुभ अवसरों पर इन गीतों का गायन किया जाता है।इन गीतों में भगवान गणेश, विष्णु, सूर्य, चंद्रमा, पंचनाम देवता तथा विभिन्न देवी-देवताओं का स्मरण करते हुए परिवार की सुख-समृद्धि और मंगल की कामना की जाती है। विशेष रूप से उत्तराखंड में गाए जाने वाले मांगल गीतों का संबंध माता नंदा देवी और भगवान शिव-पार्वती की पौराणिक परंपराओं से जुड़ा हुआ माना जाता है।

जागर केवल गीत नहीं, देवताओं तक पहुंचने वाली आस्था की आवाज

उत्तराखंड की लोक संस्कृति में जागर का विशेष महत्व है। यह केवल लोकगायन नहीं बल्कि एक धार्मिक और आध्यात्मिक परंपरा है, जिसके माध्यम से देवी-देवताओं, पितरों और लोकदेवताओं का आह्वान किया जाता है।निहारिका सती का मानना है कि जागर केवल संगीत नहीं बल्कि एक ऐसा भाव है जो सीधे देवताओं तक पहुंचता है। यदि यह परंपरा समाप्त हो गई तो उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान को गहरा आघात पहुंचेगा। मां और दादी से मिली संस्कृति की विरासतनिहारिका सती बताती हैं कि उनकी संस्कृति यात्रा की सबसे बड़ी प्रेरणा उनकी मां हैं।उनके अनुसार, उनकी दादी मांगल गीतों की उत्कृष्ट गायिका थीं। बाद में उनकी मां ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया और अपना पूरा जीवन मांगल और जागर के संरक्षण को समर्पित किया। बचपन से ही घर के वातावरण में लोकगीतों की धुन सुनते-सुनते निहारिका ने इन विधाओं को सीखा।वे कहती हैं कि उनकी मां ही उनकी पहली गुरु हैं और आज भी उनका मार्गदर्शन करती हैं।

10 वर्षों का संघर्ष, फिर भी नहीं छोड़ा संस्कृति का साथ

नीतू उर्फ निहारिका सती पिछले लगभग दस वर्षों से इस क्षेत्र में कार्य कर रही हैं। वे बताती हैं कि शुरुआत में लोगों ने उनके इस प्रयास को गंभीरता से नहीं लिया। कई बार उनका मजाक भी बनाया गया, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।उनका कहना है कि आज तक उन्हें इस कार्य के लिए न तो अपेक्षित सम्मान मिला और न ही पर्याप्त मंच। बावजूद इसके वे लगातार अपनी संस्कृति को बचाने के लिए समर्पित भाव से कार्य कर रही हैं।

युवाओं की उदासीनता बनी बड़ी चुनौती

निहारिका सती के अनुसार आज की युवा पीढ़ी आधुनिक संगीत की ओर अधिक आकर्षित है, जबकि जागर और मांगल जैसी पारंपरिक विधाओं में उनकी रुचि सीमित होती जा रही है।वे मानती हैं कि यदि युवाओं को इन परंपराओं का महत्व समझाया जाए तो वे अवश्य इससे जुड़ेंगे। इसके लिए विद्यालयों और व महाविद्यालयों में लोक संस्कृति आधारित पाठ्यक्रम कार्यशालाएं और सांस्कृतिक गतिविधियां आयोजित की जानी चाहिए।

डिजिटल युग बन सकता है संस्कृति संरक्षण का माध्यम

निहारिका का मानना है कि इंटरनेट और सोशल मीडिया आज लोक संस्कृति के संरक्षण का सबसे प्रभावी माध्यम बन सकते हैं।यदि जागर, मांगल और अन्य लोक परंपराओं को डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से युवाओं तक पहुंचाया जाए तो इनका संरक्षण अधिक प्रभावी ढंग से किया जा सकता है। उत्तराखंड की लोक संस्कृति, मांगल गीत और जागर परंपरा को जीवंत बनाए रखने वाली युवा लोकगायिका निहारिका शती विभिन्न धार्मिक, सांस्कृतिक एवं मांगलिक आयोजनों में अपनी प्रस्तुति दे रही हैं।
यदि आप अपने कार्यक्रम में पारंपरिक मांगल गीत, जागर एवं लोक सांस्कृतिक प्रस्तुति के लिए उन्हें आमंत्रित करना चाहते हैं तो व्हाट्सएप नंबर +91 74530 49054 पर संपर्क कर सकते हैं। निहारिका सती का उद्देश्य देवभूमि की लोक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाना है।

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