लोकसभा चुनाव के नतीजों ने 20 साल पहले की झलक दिखा दी। 2004 में हुए आम चुनावों के परिणाम हैरान करने वाले थे। पीएम नरेंद्र मोदी इस बार भाजपा की “प्रचंड जीत” के साथ केंद्र की सत्ता पर लगातार तीसरी बार काबिज होने की तैयारी कर रहे थे। लेकिन बीजेपी सरकार बनाने के लिए बहुमत के आंकड़े से दूर रह गई। प्रधानमंत्री की “गारंटी” भी वोटरों पर अपना असर नहीं डाल सकी। जिसका नतीजा हुआ कि भाजपा अपने ही मैदान में एक बड़ा मोर्चा हार गई। उत्तर भारत के 10 हिंदी भाषी राज्यों में पार्टी ने 55 सीटें गवां दीं। वहीं एग्जिट पोल के सभी दावे भी ध्वस्त हो गए । अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सरकार चलाने के लिए पूरी तरह से अपने सहयोगी दलों पर निर्भर रहना होगा। 16 केंद्रीय मंत्री भी अपनी सीट नहीं बचा सके। कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के लिए यह चुनाव फायदे का सौदा रहा। राहुल गांधी ने दोनों सीटों वायनाड और रायबरेली से साढ़े तीन-तीन लाख से अधिक वोटों से जीत हासिल की। यह बड़ी जीत राहुल गांधी में आत्मविश्वास पैदा कर गई है। सोमवार, 3 जून साल 2024 तक भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तीसरी बार “बड़ी जीत” को लेकर पूरी तरह से आश्वस्त थे। 24 घंटे बाद आने वाले लोकसभा चुनाव के परिणाम को लेकर भाजपाइयों ने जोश के साथ जश्न मनाने के लिए पूरी तैयारी कर रखी थी। प्रधानमंत्री 350 से लेकर 400 तक सीटों का दावा कर रहे थे। इसी सपने के साथ पीएम मोदी समेत तमाम भाजपा नेताओं ने जैसे-तैसे 3 जून की रात इस उम्मीद के साथ काटी कि अगली सुबह देश में सियासत का “नया अध्याय” लिखा जाएगा। लेकिन इस बार मतपेटियों से निकले जनादेश ने भाजपा के सारे समीकरण बिगाड़ दिए। 4 जून का पूरा देश इंतजार कर रहा था। मंगलवार को लोकसभा चुनाव परिणामों ने पीएम मोदी के अरमानों पर पानी फेर दिया। क्योंकि यह चुनाव भी मोदी के चेहरे पर लड़े गए थे। हालांकि भाजपा तीसरी बार सरकार बनाने जा रही है लेकिन इस बार एनडीए दलों के नेताओं ने उसके हाथ बांध दिए हैं। वहीं कांग्रेस और राहुल गांधी के लिए यह चुनाव फायदे का सौदा रहा । इस बार चुनाव के नतीजों ने 20 साल पहले की झलक दिखा दी। 2004 में हुए आम चुनावों के परिणाम आश्चर्य जनक और हैरान करने वाले थे। जब किसी ने सोचा भी नहीं था कि केंद्र की सत्ता में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार नहीं आएगी। लेकिन देश की जनता ने भाजपा को विपक्ष का दर्जा दे दिया था। इन चुनावों नतीजों ने साल 2004 की यादें ताजा कर दी। पीएम मोदी की आयु (करीब 74 साल) के हिसाब से देखें तो उनके लिए यह चुनाव बहुत ही महत्वपूर्ण थे। मोदी इस बार भाजपा की प्रचंड जीत के साथ केंद्र की सत्ता पर लगातार तीसरी बार काबिज होने की तैयारी कर रहे थे। लेकिन भाजपा सरकार बनाने के लिए बहुमत के आंकड़े से भी बहुत दूर रह गई। इस बार एग्जिट पोल के सभी दावे ध्वस्त हो गए । भाजपा को 240 सीटें मिलीं, जो बहुमत के आंकड़े से 32 सीट कम हैं। एनडीए को 292 सीटें मिली हैं। 4 जून प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए पिछले 20 साल के सियासी करियर में बुरा दिन साबित हुआ। साल 2014, 2019 और 2024 यह तीनों लोकसभा चुनाव नरेंद्र मोदी के चेहरे पर ही लड़े गए। प्रधानमंत्री की “गारंटी” भी वोटरों पर अपना असर नहीं डाल सकी। जिसका नतीजा हुआ कि भाजपा अपने ही मैदान में एक बड़ा मोर्चा हार गई। उत्तर भारत में 10 हिंदी भाषी राज्यों में पार्टी ने 55 सीटें गवां दीं। सबसे खास बात यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वाराणसी से बहुत कम अंतर (करीब डेढ़ लाख) से चुनाव जीते। डेढ़ लाख वोटों से जीतना इसलिए कम है कि प्रधानमंत्री कई वर्षों से बनारस को हाइटेक सिटी बनाने में लगे रहे। पिछले 10 वर्षों से काशी में खूब विकास कार्य हुए। इसके बावजूद वाराणसी की जनता ने पीएम मोदी पर खुलकर प्यार नहीं बरसाया। लोकसभा सीटों के हिसाब से देश का सबसे बड़ा राज्य उत्तर प्रदेश को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अच्छी तरह से आकलन नहीं कर पाए । यूपी में राहुल गांधी और अखिलेश यादव की जोड़ी ने शानदार प्रदर्शन करते हुए भाजपा को दूसरे नंबर की पार्टी बना दिया। प्रदेश में अखिलेश यादव की सपा सबसे बड़ी पार्टी बन गई है । भाजपा को यूपी में सबसे ज्यादा 29 सीटों का नुकसान हुआ है। 2019 में उसे 62 सीटें मिली थीं, जबकि इस बार पार्टी 33 पर सिमट गई। दूसरा सबसे बड़ा राज्य राजस्थान है, जहां उसे 10 सीटों का नुकसान हुआ। 2019 की 24 के मुकाबले इस बार उसे 14 सीटों पर ही जीत मिल सकी है। बिहार में भाजपा 2019 के मुकाबले 5 सीटों के नुकसान में रही। यहां उसकी सीटें 17 से घटकर 12 रह गईं। इसी तरह झारखंड में पिछली बार की 12 के मुकाबले उसे 8 सीटें ही मिलीं। यानी कुल 4 सीटों का नुकसान हुआ। वहीं हरियाणा में पार्टी 10 से घटकर 5 सीटों पर सिमट गई। वहीं महाराष्ट्र में भी भाजपा को जबरदस्त झटका लगा । 2019 की 23 के मुकाबले इस बार 9 सीटें ही मिली हैं। यानी वहां भाजपा को पूरी 14 सीटों का नुकसान उठाना पड़ा है। नतीजा यह हुआ इस लोकसभा चुनाव में अपने बूते बहुमत हासिल नहीं कर सकी। कुल मिलाकर यह चुनाव परिणाम भाजपा के लिए बेहद निराशाजनक रहे। अब भाजपा को अपने सहयोगी तेलुगु देशम पार्टी और जदयू समेत तमाम दलों को विश्वास को लेकर सरकार चलाना होगा।



