नजर लग गई मेरे पहाड़ों को
कैसे नीचे शिकारी की
नोच नोच के खा गए इसको
छांव रही ना हरियाली बची ll
विकास के नाम पर बना दिए बांध
सुनी न आह जलधारों की
सूख रही है चंचल नदियां
दिखती न चिंता सरकारों की
तोड़े पहाड़ नष्ट की सुंदरता
हरे भरे मनमोहक पहाड़ो की
उजाड कर हरे भरे पहाड़
राहें बनाई व्यपारों की ll
हो रही सौदेबाजी खेत खलिहान की
कौन करेगा चिंता प्रेंति की
इन धन लोलुप के खिलवाड़ों से ll
कट रहे जंगल,विषैली हो रही हवा
मौज हो रही चौकीदार,ठेकेदारों की
जेब भर रही चंदन तस्करों
गजराज के हत्यारों की
हो रही दुर्गति प्रेंति की
मनोहारी हरे भरे श्रृंगारों की
चुप्पी तोड़ो,उठो जागो
रक्षा करो हरे भरे पहाड़ों की ll
.. …. .. अनीता चमोली
….. उत्तराखंड देहरादून



