होली भारतीय जीवन-दर्शन की सजीव अभिव्यक्ति है। यह केवल रंगों का खेल नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, सामाजिक समरसता और प्रकृति-संतुलन का संदेश देने वाला पर्व है। इसका मूल प्रेरक प्रसंग प्रह्लाद और होलिका की कथा से जुड़ा है, जो सत्य और श्रद्धा की विजय तथा अहंकार के दहन का प्रतीक है। होलिका-दहन केवल लकड़ियों को जलाने की परंपरा नहीं, बल्कि अपने भीतर के क्रोध, ईर्ष्या, द्वेष और अहंकार को अग्नि में समर्पित करने का सांकेतिक आह्वान है।
रंगों का आध्यात्मिक अर्थ भी अत्यंत गहरा है। लाल प्रेम और ऊर्जा का, पीला ज्ञान और पवित्रता का, हरा जीवन और समृद्धि का, तथा नीला व्यापक चेतना का प्रतीक है। जब हम एक-दूसरे को रंग लगाते हैं, तो मानो भेदभाव की रेखाएँ मिटाकर एकात्मता का संकल्प लेते हैं। विविध रंगों का संगम हमें “विविधता में एकता” का सांस्कृतिक सूत्र सिखाता है।
वैज्ञानिक दृष्टि से भी होली का विशेष महत्व है। यह फाल्गुन पूर्णिमा को मनाई जाती है, जब शीत ऋतु से ग्रीष्म ऋतु की ओर संक्रमण होता है। यह समय शरीर की प्रतिरोधक क्षमता के लिए संवेदनशील माना जाता है। परंपरागत रूप से टेसू के फूल, चंदन, हल्दी और प्राकृतिक गुलाल का प्रयोग किया जाता था, जिनमें औषधीय गुण होते थे। होलिका-दहन की अग्नि के समीप बैठने को भी स्वास्थ्यवर्धक माना गया। आज रासायनिक रंगों के दुष्प्रभावों को देखते हुए आवश्यक है कि हम पुनः प्राकृतिक और पर्यावरण-अनुकूल परंपराओं की ओर लौटें।
सांस्कृतिक स्तर पर होली सामाजिक एकता का उत्सव है। गाँवों में फाग-गीतों की गूँज, चौपालों पर हास-परिहास और नगरों में सांस्कृतिक आयोजन समाज के ताने-बाने को सुदृढ़ करते हैं। यह पर्व पुराने मनमुटाव भुलाकर संबंधों को नया आयाम देने का अवसर प्रदान करता है।
समकालीन परिप्रेक्ष्य में होली की गरिमा बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है। “बुरा न मानो होली है” का अर्थ मर्यादा भंग करना नहीं, बल्कि आत्मीयता के साथ आनंद बाँटना है। महिलाओं के सम्मान, सामाजिक उत्तरदायित्व और सार्वजनिक शालीनता का ध्यान रखते हुए उत्सव मनाना ही सच्ची भारतीयता है।
आज भारत सांस्कृतिक आत्मविश्वास की नई यात्रा पर अग्रसर है। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में “विकसित भारत” की परिकल्पना केवल आर्थिक प्रगति तक सीमित नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पुनर्जागरण से भी जुड़ी है। योग, आयुर्वेद और भारतीय त्योहारों की बढ़ती वैश्विक प्रतिष्ठा इस परिवर्तन का संकेत है। यदि होली को पर्यावरण-संवेदनशीलता, नशामुक्ति और आध्यात्मिक चेतना के साथ प्रस्तुत किया जाए, तो यह भारत की सॉफ्ट पावर को और सुदृढ़ कर सकती है।
डिजिटल युग में जहाँ आभासी संवाद बढ़ रहा है, वहीं प्रत्यक्ष मानवीय संपर्क कम होता जा रहा है। होली हमें मिलन, स्नेह और सामूहिक उल्लास का अवसर देती है। यदि हम इस अवसर पर वंचित वर्गों, वृद्धजनों और जरूरतमंदों के साथ रंग साझा करें, तो यह उत्सव करुणा और सेवा की भावना को भी सशक्त करेगा।
अंततः, होली हमें यह सिखाती है कि बाहरी रंग क्षणिक हैं, किंतु आंतरिक प्रेम और सद्भाव शाश्वत हैं। यदि हम अपने भीतर के अहंकार को जला दें और हृदय में करुणा का रंग भर दें, तो प्रत्येक दिन होली बन सकता है। आइए, इस होली पर हम संकल्प लें कि मर्यादा का उल्लंघन नहीं, बल्कि मर्यादा का उत्सव मनाएँगे; विभाजन नहीं, विश्वास का रंग फैलाएँगे; और उच्छृंखलता नहीं, सद्भाव और शालीनता का संदेश देंगे। तभी होली वास्तव में आध्यात्मिक चेतना और वैज्ञानिक दृष्टि का सच्चा सांस्कृतिक उत्सव बन सकेगी।



