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Home » परमात्मा शिव मानव को देव समान बनने की दे रहे शिक्षा!
दुनिया

परमात्मा शिव मानव को देव समान बनने की दे रहे शिक्षा!

Pahad ki KhabarBy Pahad ki KhabarFebruary 15, 2026No Comments
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महाशिवरात्रि का महापर्व कई आध्यात्मिक रहस्यों को समेटे हुए है। यह पर्व सभी पर्वों में महान और श्रेष्ठ है, क्योंकि शिवरात्रि परमात्मा के दिव्य अवतरण का यादगार महापर्व है। परमात्मा ने श्रीमद् भागवत गीता में कहा है कि यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥ परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥
वास्तव में अब नई सृष्टि के सृजन का संधिकाल चल रहा है। इसमें सृष्टि के सृजनकर्ता स्वयं नवसृजन की पटकथा लिख रहे हैं। वह इस धरा पर आकर मानव को देव समान स्वरूप में खुद को ढालने का गुरुमंत्र राजयोग सिखा रहे हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात दुनिया की यह सबसे बड़ी और महान घटना बहुत ही गुप्त रूप में घटित हो रही है। वक्त की नजाकत को देखते हुए जिन्होंने इस महापरिवर्तन को भाप लिया है वह निराकार परमात्मा की भुजा बनकर संयम के पथ पर बढ़ते जा रहे हैं। ऐसे लोगों की संख्या एक दो नहीं बल्कि लाखों में है। इन्होंने न केवल परमात्मा की सूक्ष्म उपस्थिति को महसूस किया है वरन इस महान कार्य के साक्षी भी बन रहे हैं।

शिव पर अर्पित करे

महाशिवरात्रि पर्व पर हम शिवालयों में अक-धतूरा, भांग, आदि अर्पित करते हैं। इसके पीछे आध्यात्मिक रहस्य यह है कि जीवन में जो कांटों के समान बुराइयां हैं, गलत आदतें हैं, गलत संस्कार हैं, कांटों के समान बोल, गलत बोल- सोच को आज के दिन शिव पर अर्पण कर मुक्त हो जाएं। हम दुनिया में देखते हैं कि दान की गई वस्तु वापस नहीं ली जाती है, इसी तरह परमात्मा पर आज के दिन अपने जीवन की कोई एक बुराई जो हमें आगे बढऩे से रोक रही है, सफलता में बाधक है उसे शिव को सौंपकर मुक्त हो जाएं। अपने जीवन की समस्याएं, बोझ उन्हें सौंप दें। फिर आपकी जिम्मेदारी परमात्मा की हो जाएगी। एक बच्चे का हाथ जब उसके पिता पकड़कर चलते हैं तो वह निश्चिंत रहता है, इसी तरह हम भी यदि खुद को परमात्मा को सौंपकर जीवन में चलते हैं तो सदा निश्चिंत रहते हैं। अपने पांच खोटे सिक्के अर्थात् काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार को प्रभु को अर्पण कर रोज ईश्वर के दर पर आना ही महाशिवरात्रि का संदेश है।

ज्योतिर्बिंदु स्वरूप हैं परमात्मा

भारत में 12 ज्योतिर्लिंग प्रसिद्ध हैं और गली-गली में शिवालय बने हुए हैं। इससे स्पष्ट होता है कि वह परमपिता परमात्मा कभी इस सृष्टि पर आएं हैं और विश्व कल्याण का कार्य किया है, तभी तो हम उन्हें याद करते हैं। परमात्मा का स्वरूप ज्योतिर्बिंदु है। श्रीमद्भ भगवत गीता से लेकर महाभारत, शिवपुराण, रामायण, यजुर्वेद, मनुस्मृित सभी में कहीं न कहीं परमात्मा के अवतरण की बात कही गई है। किसी भी धर्म ग्रंथ में परमात्मा के जन्म लेने की बात नहीं है। हर जगह प्रकट होने, अवतरण पर परकाया प्रवेश की बात को ही इंगित किया गया है। क्योंकि परमात्मा का अपना कोई शरीर नहीं होता है। वह परकाया प्रवेश कर नई सतयुगी सृष्टि की स्थापना का दिव्य कार्य कराते हैं। यहां तक कि शिवपुराण में स्पष्ट लिखा है कि मैं ब्रह्मा के ललाट से प्रकट होऊंगा। शिव जन्ममरण से न्यारे हैं। ब्रह्मा, विष्णु और शंकर के भी रचयिता त्रिमूर्ति हैं, जिन्हें हम परमात्मा शिव कहते हैं।

शिव और शंकर में है महान अंतर

परमपिता शिव और शंकरजी में महान अंतर हैं। शिवजी और शंकरजी में वही अंतर है जो एक पिता-पुत्र में होता है। इस सृष्टि के विनाश कराने के निमित्त परमात्मा ने ही शंकरजी को रचा। यहीं नहीं ब्रह्मा, विष्णु, शंकरजी के रचनाकार, सर्वशक्तिमान, सर्वोच्च सत्ता, परमेश्वर शिव ही हैं। वह ब्रह्मा द्वारा सृष्टि की स्थापना, शंकर द्वारा विनाश और विष्णु द्वारा पालना कराते हैं। शिवलिंग परमात्मा शिव की प्रतिमा है। परमात्मा निराकार ज्योति स्वरूप हैं। शिव का अर्थ है कल्याणकारी और लिंग का अर्थ है चिंह्न। अर्थात् कल्याणकारी परमात्मा को साकार में पूजने के लिए शिवलिंग का निर्माण किया गया। शिवलिंग को काला इसलिए दिखाया गया क्योंकि अज्ञानता रूपी रात्रि में परमात्मा अवतरित होकर अज्ञान-अंधकार मिटाते हैं। परमपिता परमात्मा शिव 33 करोड़ देवी-देवताओं के भी महादेव एवं समस्त मनुष्यात्माओं के परमपिता हैं। सारी सृष्टि में परमात्मा को छोड़कर सभी देवी-देवताओं का जन्म होता है। जबकि परमात्मा का दिव्य अवतरण होता है। वे अजन्मा, अभोक्ता, अकर्ता और ब्रह्मलोक के निवासी हैं। शंकरजी का आकारी शरीर है। शंकरजी, परमात्मा शिव की रचना हैं। यही वजह है कि शंकर हमेशा शिवलिंग के सामने तपस्या करते हुए दिखाए जाते हैं। ध्यानमग्न शंकरजी की भाव-भंगिमाएं एक तपस्वी के अलंकारी रूप हैं। शंकर और शिव को एक समझ लेने के कारण हम परमात्म प्राप्तियों से वंचित रहे। अब पुन: अपना भाग्य बनाने का मौका है।

शिवलिंग पर तीन रेखाएं ही क्यों?

शिवलिंग पर तीन रेखाएं परमात्मा द्वारा रचे गए तीन देवताओं की ही प्रतीक हैं । परमात्मा शिव तीनों लोकों के स्वामी हैं। तीन पत्तों का बेलपत्र और तीन रेखाएं परमात्मा के ब्रह्मा, विष्णु, शंकर के भी रचयिता होने का प्रतीक हैं। वे प्रजापिता ब्रह्मा द्वारा सतयुगी दैवी सृष्टि की स्थापना, विष्णु द्वारा पालना और शंकर द्वारा कलियुगी आसुरी सृष्टि का विनाश कराते हैं। इस सृष्टि के सारे संचालन में इन तीनों देवताओं का ही विशेष अहम योगदान है।

शिव के साथ क्या है रात्रि का संबंध…?

विश्व की सभी महान विभूतियों के जन्मोत्सव मनाए जाते हैं, लेकिन परमात्मा शिव की जयंती को जन्मदिन न कहकर शिवरात्रि कहा जाता है, आखिर क्यों? इसका अर्थ है परमात्मा जन्ममरण से न्यारे हैं। उनका किसी महापुरुष या देवता की तरह शारीरिक जन्म नहीं होता है। वह अलौकिक जन्म लेकर अवतरित होते हैं। उनकी जयंती कत्र्तव्य वाचक रूप से मनाई जाती है। जब- जब इस सृष्टि पर पाप की अति, धर्म की ग्लानि होती है और पूरी दुनिया दु:खों से घिर जाती है तो गीता में किए अपने वायदे अनुसार परमात्मा इस धरा पर अवतरित होते हैं।

शिव कौन हैं?

भारत देश 33 करोड़ देवी देवताओं का देश है। परन्तु इन सभी देवताओं को बनाने वाले एक ही परमपिता परमात्मा शिव है । जिसकी अनेक धर्मों, अनेक रूपों में भले ही पूजा की जाती हैं। परन्तु उसका केन्द्र बिन्दु परमात्मा शिव के पास ही जाकर समाप्त होता है। परमात्मा शिव देवों के भी देव महादेव, ब्रहा, विष्णु, शंकर के भी रचयिता त्रिमूर्ति, तीनों लोकों को के मालिक त्रिलोकीनाथ, तीनों कालों को जानने वाले त्रिकालदर्शी हैं। विश्व की सभी आत्माओं के परमपिता परमात्मा शिव हंै। परमात्मा जन्ममरण से न्यारे हैं । उनका जन्म नहीं होता बल्कि परकाया प्रवेश होता है। परमपिता शिव अजन्मा हैं, अभोक्ता, ज्ञान के सागर हैं, आनंद के सागर हैं, प्रेम के सागर, सुख के सागर हैं। उनका स्वरूप ज्योतिर्बिन्दु है। परमात्मा शिव परमधाम के निवासी है। शिव का अर्थ ही है ‘कल्याणकारी। परमात्मा शरीरधारी नहीं है। इसका मतलब ये नहीं कि उनका कोई आकार नहीं। बल्कि स्थूल आंखों से न दिखने वाला सूक्ष्म ज्योति स्वरूप है। परमात्मा शिव को सभी ग्रंथों, पुराणों और वेदों में भी सर्वोपरी ईश्वर माना गया हंै।

मेरा जन्म दिव्य और अलौकिक है

गीता में भगवान के महावाक्य हैं- मेरा जन्म दिव्य और अलौकिक है। मैं सूर्य, चांद और तारागण के भी पार परमधाम का वासी हूं। परमात्मा कहते हैं कि मैं प्रकृति को वश करके इस लोक में सतधर्म की स्थापना करने और प्राय: लुप्त हुआ ज्ञान सुनाने आता हूं। वत्स तू मन को मुझ में लगा। मैं तुझे सब पापों से मुक्त करुंगा, मैं तुम्हें परमधाम ले चलूंगा। अब सवाल उठता है कि वह लुप्त हुआ ज्ञान क्या है? यदि वर्तमान में दिया जा रहा ज्ञान सही है तो फिर परमात्मा को इस धरा पर क्यों आना पड़ता है? आखिर इस सृष्टि में सत्य ज्ञान क्यों और कैसे लुप्त हो जाता है? सत्य ज्ञान से मनुष्य दूर क्यों हो जाते हैं? इन सवालों के जवाब स्वयं परमात्मा राजयोग की शिक्षा के आधार पर देते हैं।

जहां सत्य ज्ञान है वहां पवित्रता है

आध्यात्मिकता स्वयं की रुचि, पुरुषार्थ और लगन से ही संभव है। आत्मा में सत्य से शक्ति आती है। इस विद्यालय में आत्मा को सुंदर पवित्र बनाने की शिक्षा दी जाती है। हम हर एक अपने जीवन के मालिक बनें। योगी बनना अर्थात् योग्य बनना। भगवान के बच्चे कहलाने लायक बनना। खुद के जीवन को सुधार कर दूसरों के लिए शुभभावना रखें। हम ईश्वर के बच्चे हैं इस स्वमान में रहने की जरूरत है। आज हम हर बात को विज्ञान की कसौटी पर खरा उतरने के बाद ही अपनाते हैं तो धर्म के मामले में अंधश्रद्धा क्यों? जहां सत्य ज्ञान है वहां पवित्रता है और स्वच्छता है। शास्त्रों में वर्णित धर्म की अतिग्लानि का यह वही समय है। इस समय ही स्वयं परमपिता परमात्मा आकर मानव को फिर से देव बनने की शिक्षा देते हैं। यदि हम पवित्र बनें तो इस भूमि पर स्वर्ग आने में देरी नहीं लगेगी।

तेजी से बदल रहा दुनिया का परिदृश्य

सृष्टि का शाश्वत नियम है कि कोई भी चीज हमेशा अपने मूल स्वरूप में नहीं रहती है। बदलाव या परिवर्तन प्रकृति का नियम है। जैसे- दिन के बाद रात और रात के बाद दिन का आना तय है, उसी तरह सृष्टि चक्र में सतयुग के बाद त्रेतायुग, द्वापरयुग और फिर कलियुग क्रम से आना तय है। चाहे प्रकृति का बिगड़ता संतुलन हो या समाज से विलुप्त होतीं मानवीय संवेदनाएं और गिरता नैतिक चरित्र, कहीं न कहीं विश्व परिवर्तन का स्पष्ट इशारा कर रही हैं। समय रहते इसे गंभीरता से समझने की जरूरत है। क्योंकि यह बदलाव ईश्वरीय संविधान का हिस्सा है, जो मानव के हित में है। धर्मग्लानि के जो चिंह्न शास्त्रों में बताए गए हैं वर्तमान में दुनिया की स्थिति उससे भी दयनीय और गंभीर हो गई है। मनुष्य का नैतिक और चारित्रिक रूप से इतना पतन हो चुका है कि ऐसे कार्यों का तो शास्त्रों, वेद-ग्रंथों तक में उल्लेख नहीं है।

प्रकृति भी दे रही है परिवर्तन का संकेत

सृष्टि के आदि में प्रकृति अपने मूल स्वरूप में थी। सतोप्रधान थी। हर तत्व सुखदायी था। समय के साथ प्रकृति भी बदलती गई। उसके पांचों तत्वों में मानवीय दोहन से विकृत होना शुरू हो गया। आज असमय ही बाढ़, भूकंप, तूफान, आगजनी आम बात हो गई है। ये सभी बातें प्रकृति के बदलाव अर्थात् परिवर्तन की ओर संकेत कर रही हैं। संहार के बाद नवसृजन सृष्टि चक्र का नियम है। आज स्थिति यह है कि बड़े महानगरों में शुद्ध पेयजल तक का अभाव होने लगा है। शुद्ध ऑक्सीजन की कमी होने लगी है। जंगल और पेड़ों की संख्या दिनोंदिन घट रही है, उस अनुपात में पौधारोपण न के बराबर हो रहा है। कार्बन उत्सर्जन से वायु प्रदूष में भी तेजी से बढ़ोतरी हो रही है। उर्वरकों के प्रयोग से मिट्टी की उर्वरा शक्ति घट रही है।

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