आईएएस आर. मीनाक्षी सुंदरम का बयान: यूआईआईडीबी को 7 हजार बीघा जमीन नहीं मिली, आरोप काल्पनिक
देहरादून। प्रमुख सचिव नियोजन एवं उत्तराखंड इंफ्रास्ट्रक्चर एंड इन्वेस्टमेंट डेवलपमेंट बोर्ड (यूआईआईडीबी) के प्रबंध निदेशक आईएएस डॉ. आर. मीनाक्षी सुंदरम ने शनिवार को स्वतंत्र मीडिया और कुछ राजनीतिक दलों द्वारा लगाए गए आरोपों का जवाब देते हुए स्पष्ट कहा कि बोर्ड को 7 हजार बीघा जमीन न तो मिली है और न ही मिलने का कोई प्रयास चल रहा है। उन्होंने इस आंकड़े को “काल्पनिक” करार दिया। 
एएनआई से बातचीत में सुंदरम ने कहा कि हाल में यूआईआईडीबी के कार्यक्रमों और परियोजनाओं पर सवाल उठाए गए। “सात हजार बीघा जमीन न तो यूआईआईडीबी को मिला है, न यूआईआईडीबी नाम की संस्था ऐसी कोई कोशिश कर रही है।” उन्होंने बताया कि अब तक बोर्ड को केवल 45 एकड़ जमीन पहचान कर मिली है।
उन्होंने बोर्ड के गठन का कारण बताया। राज्य में निवेश समिट, 2045 तक विकसित राज्य बनाने का लक्ष्य, हॉस्पिटैलिटी-वेलनेस सेक्टर में निवेश और प्रधानमंत्री के विजन के अनुरूप उत्तराखंड को वेडिंग डेस्टिनेशन बनाने की जरूरत थी। बाहरी निवेशकों के लिए जमीन खरीद की प्रक्रिया जटिल होने के कारण लैंड बैंक बनाना जरूरी था। यूआईआईडीबी इसी उद्देश्य से बना है। पंजाब (पीआईडीबी) और गुजरात के बाद उत्तराखंड तीसरा ऐसा राज्य है।
बोर्ड ट्रांजैक्शन एडवाइजर के रूप में काम करता है। विभिन्न विभागों की पीपीपी परियोजनाएं उसे रेफर की जाती हैं। आय का 92 प्रतिशत हिस्सा सरकार को जाता है। अभी तक केवल तीन बिड जारी हुए हैं, कोई फाइनल नहीं हुआ।
ऋषिकेश पीडब्ल्यूडी गेस्ट हाउस के उदाहरण पर उन्होंने कहा कि दो एकड़ जमीन का सर्किल रेट 92 करोड़ रुपये है। यह 6 साल की लीज है, 90 साल की नहीं। राज्य के अतिथियों के लिए कमरे और भोजन मुफ्त रखने की शर्त है। नेट प्रेजेंट वैल्यू के आधार पर सरकार को 712 करोड़ रुपये मिलेंगे, जबकि जमीन की मौजूदा वैल्यू करीब 200 करोड़ है। मुद्रास्फीति को भी हिसाब में लिया गया है।
सुंदरम ने कहा कि रेलवे की खाली पड़ी जमीन की तर्ज पर राष्ट्रीय एजेंडे के तहत एसेट मोनेटाइजेशन हो रहा है। गलत सूचना फैलने से बचाने के लिए वे तथ्य सार्वजनिक कर रहे हैं। अंतिम मंजूरी मुख्यमंत्री स्तर पर होती है और समिति की अध्यक्षता मुख्य सचिव करते हैं।




