ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण पर जोर

देहरादून, 13 अक्टूबर। उत्तराखंड में जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने और ग्रामीण समुदायों की आजीविका को मजबूत बनाने के उद्देश्य से मंगलवार को होटल फेयरफील्ड, देहरादून में एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। राज्य पर्यावरण संरक्षण एवं जलवायु परिवर्तन निदेशालय तथा संबंधित सहयोगी संस्था के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित कार्यशाला में जलवायु-अनुकूल आजीविका मॉडल विकसित करने और उन्हें ग्रामीण क्षेत्रों में व्यापक स्तर पर लागू करने की रणनीतियों पर चर्चा की गई।
कार्यक्रम में उत्तराखंड शासन के वन एवं पर्यावरण विभाग के सचिव सी. रविशंकर मुख्य अतिथि तथा भारत सरकार के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की उप सचिव डॉ. रुचिका दराल विशिष्ट अतिथि के रूप में शामिल हुईं। निदेशक पर्यावरण एस.पी. सुबुद्धि सहित विभिन्न विभागों, संस्थानों और संबंधित परियोजनाओं के प्रतिनिधियों ने भी प्रतिभाग किया।
ग्रामीण आजीविका को टिकाऊ बनाने पर जोर
कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को ध्यान में रखते हुए ग्रामीण क्षेत्रों में आजीविका के ऐसे विकल्पों को प्रोत्साहित करना था, जो पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ स्थानीय समुदायों की आर्थिक स्थिति को भी मजबूत कर सकें। इस दौरान कृषि, बागवानी, पशुपालन, बीज उत्पादन और अन्य ग्रामीण गतिविधियों को जलवायु के अनुकूल बनाने के उपायों पर विचार-विमर्श किया गया।
कार्यशाला का शुभारंभ निदेशक पर्यावरण एस.पी. सुबुद्धि ने अतिथियों एवं प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए किया। उन्होंने कार्यशाला के उद्देश्यों और जलवायु-अनुकूल आजीविका मॉडल के विस्तार की आवश्यकता पर प्रकाश डाला।
वनाग्नि रोकथाम में कार्बन फाइनेंस की भूमिका पर चर्चा
कार्यशाला के तकनीकी सत्र में संयुक्त निदेशक वैभव कुमार सिंह ने वनाग्नि की रोकथाम में कार्बन फाइनेंस की भूमिका और इसकी संभावनाओं की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि कार्बन फाइनेंस के माध्यम से वन संरक्षण, कार्बन उत्सर्जन में कमी और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने से जुड़ी गतिविधियों के लिए वित्तीय सहयोग जुटाने की संभावनाएं विकसित की जा सकती हैं।
उन्होंने वन क्षेत्रों के संरक्षण और जलवायु-अनुकूल गतिविधियों को बढ़ावा देने में कार्बन फाइनेंस के महत्व पर भी प्रकाश डाला। उत्तराखंड जैसे वन बहुल राज्य में वनाग्नि के जोखिम को कम करने और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के लिए इस तरह के वित्तीय विकल्पों की उपयोगिता पर चर्चा की गई।
विभागों के बीच समन्वय से प्रभावी क्रियान्वयन पर जोर
कार्यशाला में जलवायु-अनुकूल आजीविका मॉडल के विस्तार, ग्रामीण समुदायों के लिए रोजगार एवं आय के अवसर बढ़ाने, वनाग्नि की रोकथाम और परियोजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन जैसे विषय प्रमुखता से उठाए गए। प्रतिभागियों ने संबंधित विभागों एवं संस्थानों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने और स्थानीय स्तर पर उपलब्ध संसाधनों के सतत उपयोग को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता पर भी विचार साझा किए।
कार्यशाला में इस बात पर जोर दिया गया कि जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने के लिए ग्रामीण समुदायों को टिकाऊ आजीविका विकल्पों से जोड़ना आवश्यक है। इससे न केवल उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत हो सकती है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों के दीर्घकालिक प्रबंधन को भी बढ़ावा मिल सकता है।
कार्यक्रम का समापन जलवायु-अनुकूल आजीविका मॉडल को प्रोत्साहित करने, ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाने और वन एवं पर्यावरण संरक्षण के प्रयासों को आगे बढ़ाने के संकल्प के साथ हुआ।
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