
उत्तराखंड राज्य के गठन के बाद से, इस राज्य ने विभिन्न क्षेत्रों में अच्छी खासी प्रगति की है। शासन-प्रशासन चाहे किसी भी राजनैतिक दल का क्यों न रहा हो, लेकिन, खेलों में प्रगति बदस्तूर जारी है। इसके बावजूद यदि आज हम खेलों की बात करें, तो कहना गलत ना होगा कि कुछ दूर तो चले हैं, बहुत चलना है बाकी। राज्य के खेल और खिलाड़ियों के लिए यह प्रसन्नता की बात है, कि 38 में राष्ट्रीय खेल उत्तराखंड में होने हैं, परन्तु, कई वर्षों से इन खेलों के टलते आने के बावजूद, आज भी इन खेलों की निश्चित तारीख हमारे पास नहीं है। कोई नहीं जानता कि यह खेल इसी वर्ष होंगे या अगले वर्ष। राज्य के खेल विभाग की वेबसाइट की, यदि बात करें तो, उस पर जाने के बाद पता लगता है कि, 2020-21 के बाद से आज तक वह अपडेट नहीं हुई है, लिहाजा राज्य के खेल और खिलाड़ियों की उपलब्धियों की ताजा जानकारी इस वेबसाइट से ले पाना सम्भव नहीं है।
कई खेलों के राज्यस्तरीय नियंत्रक खेल इकाईयाँ आज दो से भी अधिक भागों में बंटी हुई हैं, इनसे खेल और खिलाड़ियों का कितना नुकसान हो रहा है, इसे कोई जानना नहीं चाहता। केवल अनुमान ही लगाया जा सकता है, कि यदि भारत की महिला हाॅकी टीम ने पेरिस ओलम्पिक-2024 के लिये क्वालीफाई किया होता, तो मैदान पर उत्तराखण्ड की दो खिलाड़ी एक साथ भारत का प्रतिनिधित्व कर रही होतीं। वह भी एक ही शहर हरिद्वार से। इसके बावजूद प्रदेश में महिला हाकी की वह स्थिति है, की वंदना कटारिया उत्तर प्रदेश से राष्ट्रीय हाकी खेलती हैं, तो मनीषा चौहान मणीपुर का प्रतिनिधित्व करती हैं। महिला हाकी की ही तरह और भी अनेक ऐसे खेल है, जिनके खिलाड़ी या तो उत्तराखण्ड से बाहर जा कर खेलने को मजबूर हैं, या फिर प्रदेश में उनके खेल और उनकी उपलब्धियों की कोई क़दर न ह पाने के कारण खेलना छोड़ देने तक पर विचार कर रहे हैं।
बात चाहें केन्द्रीय स्तर की हो या राज्य स्तर की, भले ही आज खेल और खिलाड़ियों को उपलब्ध कराई जारी सरकारी सुविधाओं और प्रोत्साहन योजनाओं को लेकर बड़े-बड़े दावे भी किये जा रहे हों, लेकिन सच यह है, कि आज भी खेल और खिलाड़ियों को लेकर तैयार खेल नीतियों में इन दिनों के प्रति सौतेला व्यवहार आज भी बदस्तूर जारी है। इससे खिलाड़ियों में रोष इस क़दर फैल रहा है, कि वह विश्वस्तरीय सफलता प्राप्त करने के बावजूद भी आने वाले खिलाड़ियों के लिये एक आदर्श अथवा ‘रोल माॅडल’ बनने की जगह अपने खेल को ही अलविदा कहने को मजबूर हैं। ऐसा खेल नीति में ‘कोर खेलों’ की भेदभावकारक व्यवस्था के कारण हो रहा है, जिस के कारण एक ओर तो कोर खेलों के खिलाड़ी अपनी छोटी-छोटी सफलताओं से राज्य और राष्ट्रस्तरीय मान-सम्मानों, नकद पुरस्कारों व प्रोत्साहन योजनाओं से मालामाल हो रहे हैं, तो पावरलिफ्टिंग और बाडी बिल्डिंग जैसे अनेक खेलों के खिलाड़ी अपने आप को उपेक्षित व ठगा हुआ सा महसूस कर रहे हैं।
हाल ही में घोषित कुशल खिलाड़ियों को उत्तराखण्ड राज्य में चार प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण की योजना भी इसी भेदभावपूर्ण खेल नीति का शिकार है, जहाँ पिछले दिनों प्रदेश द्वारा जारी सरकारी आदेशों के उत्तर में खिलाड़ियों से पर्याप्त संख्या में आवेदन ही प्राप्त नहीं हुए, जबकि कुछ खिलाड़ियों ने इन सरकारी सेवाओं को लेने से ही इनकार कर दिया, क्योंकि यह पद उन्हें उनके खेल प्रदर्शन के कद के अनुरूप नहीं लगे।
यहाँ इस बात को पूरे दावे और प्रमाण के साथ कहा जा सकता है, कि दुनियाँ के किसी भी कोने में खेला जाने वाला कोई भी खेल, आज भारतीय खिलाड़ियों के लिए न तो अजनबी है और न ही पहुँच से बाहर। बहुत कम लोगों को इस बात की जानकारी होगी की ’10 पिन बोलिंग’ जैसे खेल में भी भारत के खिलाड़ी कॉमनवेल्थ और एशियाई स्तर पर लगातार पदक जीतते चले आ रहे हैं। 2021 के टोक्यो ओलम्पिक खेलों की पदक सारणी में भले ही भारत 48वें स्थान पर था, लेकिन, यह स्थान भी चार दशकों में उसकी सर्वोच्च रैंकिंग थी। इन खेलों में भारत के खाते में कुल सात पदक थे, जिनमें एक स्वर्ण दो रजत और चार काँस्य पदक शामिल थे। एशियाई खेलों में तो भारतीय खिलाडियों ने कमाल ही कर दिया। चीन के हांगझोऊ में हुए इन खेलों में भारत ने 655 खिलाड़ियों के साथ हिस्सा लिया और अपने प्रधानमंत्री के ‘इस बार सौ के पार’ के सपने को साकार करते हुए भारत की झोली 107 पदकों से लबरेज़ कर दी, जिसमें 28 स्वर्ण, 38 रजत और 41 काँस्य पदक शामिल थे। इसके साथ ही भारत ने जकार्ता 2018 में हासिल किए गए अपने पिछले रिकॉर्ड को बहुत पीछे छोड़ दिया, जहाँ भारत के 570 खिलाड़ियों के दल ने कुल 70 पदक जीते थे, जिनमें 16 स्वर्ण, 23 रजत और 31 काँस्य शामिल थे। जिस तरह से निशानेबाजी, एथलेटिक्स, तीरन्दाजी, मुक्केबाजी, कुश्ती, क्रिकेट, हाॅकी, कबड्डी, बैडमिंटन, स्क्वैश, टेनिस, घुड़सवारी, गोल्फ और शतरंज के साथ-साथ नौकायन, पाल नौकायन, वूशु, रोलर स्केटिंग, कैनोस्प्रिंट, सेपक ताकरा और ब्रिज जैसे खेलों में भारत ने पदक जीते हैं, जिन खेलों को भारतीय प्रेमी आमतौर पर कम ही जानते हैं।
हमारे खिलाड़ियों के दमखम, लगनशीलता, क्षमता तथा समर्पण में कोई कमी नहीं है, आवश्यकता है, तो केवल उनको उनके खेल और अभ्यास के लिए समय पर राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर का वातावरण, खेल सुविधाएँ, प्रशिक्षण तथा खेल उपकरण उपलब्ध कराए जाने की तथा केंद्र और राज्य सरकारों की तरफ से उनको उपलब्ध योजनाओं, सुविधाओं पुरस्कारों, सम्मानों तथा अन्य सभी प्रकार के प्रोत्साहन योजनाओं की जानकारी उनके द्वार तक पहुँचाने की। फिर चाहें यह जिम्मेदारी शासन और प्रशासन की हो अथवा विभिन्न खेलों को नियंत्रित करने वाली खेल संस्थाओं की।
समय आ चुका है कि, अब सिर्फ खेल और खिलाड़ियों के कल्याण के विषय में सोचा जाए। देश और प्रदेश के स्तर पर कार्यरत विभिन्न खेलों की नियंत्रक संस्थाओं को भी इस बात के लिए मजबूर किया जाए, कि वह आपस में विवादों और खेलों पर नियंत्रण के लिए वैमनस्य के स्तर अदालतों में विवाद खड़ा करने से स्वयं को रोके और सिर्फ खेल और खिलाड़ियों के हितों को ताबज्जो दें।
अभी भी यह देखने में आ रहा है कि केंद्र और राज्य सरकारों की खेल नीतियों में विभिन्न खेलों और उनके खिलाड़ियों के साथ भेदभाव बरता जा रहा है। खेल नीतियों में वर्णित ‘कोर खेलों’ की व्यवस्था इसी बात का प्रमाण है। एक साल से कम समय में विश्व चैम्पियनशिप, विश्व कप और एशियाई पावरलिफ्टिंग चैंपियनशिप में सात स्वर्ण पदक जीतने के साथ-साथ ‘स्ट्रांग वूमैन आफ इंडिया का खिताब जीतने वाली हरिद्वार की श्रीमती संगीता राणा तथा 2023 में ‘मिस्टर वर्ल्ड’ बने हरिद्वार के ही बाॅडी बिल्डर कपिल गुज्जर इसी बात का जीता जागता प्रमाण हैं, कि सात अन्तर्राष्ट्रीय स्वर्ण पदक व विश्व विजेता का खिताब जीत कर भी वे राजकीय व राष्ट्रीय स्तर पर नकद पुरस्कार, आर्थिक सहायता तथा राज्य व केन्द्र सरकार द्वारा दिये जाने वाली सरकारी नौकरी सहित हर सुविधा से इसलिये वंचित हैं, क्योंकि उनका खेल ओलम्पिक में शामिल नहीं होने के कारण कोर खेलों में शामिल नहीं है। आवश्यकता है कि उन्हीं की तरह वर्तमान में जो भारतीय खिलाड़ी नए-नए खेलों में अपने शानदार प्रदर्शनों के द्वारा देश और प्रदेश का नाम रोशन करते चले आ रहे हैं, उन खेलों और खिलाड़ियों को भी, कोर खेलों कर समान ही एक समान मान्यता तथा अवसर दिये जाएँ तथा बिना किसी भेदभाव के ‘नकद पुरस्कारों’ से लेकर केंद्र और राज्य के स्तर पर दिए जाने वाले पुरस्कारों और खेल सम्मानों के मामले में भी सभी खेलों और उनके खिलाड़ियों के साथ समान व्यवहार किया जाए। साथ ही पावरलिफ्टिंग व बाॅडी बिल्डिंग सहित सभी ऐसे खेलों को अगले वर्ष उत्तराखण्ड में आयोजित होने वाले 38वें राष्ट्रीय खेलों में भी ऐसे खेलों को पदक स्पर्धा के रूप में शामिल किया जाये, जिनमें उत्तराखण्ड के खिलाड़ियों द्वारा अधिक संख्या में पदक जीतने की सम्भावना हो। साथ ही खेल नीति में कोर खेलों व नाॅन कोर खेलों की भेदभावपूर्ण व्यवस्था को समाप्त कर सभी खेल और खिलाड़ियों के साथ न्यायपूर्ण समान व्यवहार किया जाये। यदि ऐसा किया गया, तो न केवल राष्ट्रीय, बल्कि, अन्तर्राष्ट्रीय पटल पर भी उत्तराखण्ड के खिलाड़ियों का जलवा निश्चितरूप से बढ़ता हुआ नज़र आयेगा।
(चित्र परिचय- अन्तर्राष्ट्रीय महिला हाॅकी खिलाड़ियों मनीषा चौहान व वंदना कटारिया के साथ लेखक अरुण कुमार पाठक)




