त्रिवेंद्र सरकार के समय प्रदेश में भागं की खेती को बढ़ावा देने की पहल शुरू की गई थीं। वर्तमान में ट्रायल के तौर पर देहरादून, पौड़ी, बागेश्वर, चंपावत, चमोली, अल्मोड़ा जिले में 36 किसानों को भांग की खेती के लिए आबकारी विभाग की ओर से लाइसेंस जारी किए गए। लेकिन अभी तक नीति को कैबिनेट से मंजूरी नहीं मिल पाई है। प्रदेश में भांग (इंडस्ट्रियल हैंप) की व्यावसायिक खेती को बढ़ावा देने के लिए नीति फाइलों में घूम रही है। जिस कारण अभी तक व्यापक स्तर पर इसकी खेती शुरू नहीं हो पाई है। विशेषज्ञों के मुताबिक पर्वतीय क्षेत्रों में जंगली जानवरों की समस्या और सिंचाई की सुविधा न होने के कारण बंजर हो रही भूमि पर भांग की खेती किसानों की आमदनी बढ़ाने का जरिया बन सकती है।
वैश्विक स्तर पर औद्योगिक हैंप के बीज और रेशे की काफी मांग है। इसे देखते हुए त्रिवेंद्र सरकार के समय प्रदेश में इसकी खेती को बढ़ावा देने की पहल शुरू की गई थीं। वर्तमान में ट्रायल के तौर पर देहरादून, पौड़ी, बागेश्वर, चंपावत, चमोली, अल्मोड़ा जिले में 36 किसानों को भांग की खेती के लिए आबकारी विभाग की ओर से लाइसेंस जारी किए गए। उद्यान विभाग और आबकारी विभाग ने मिलकर औद्योगिक हैंप और मेडिकल कैनाबिस नीति का प्रस्ताव किया है।
शासन स्तर पर मुख्य सचिव की अध्यक्षता में नीति के प्रस्ताव को अंतिम रूप देने के लिए कई बैठकें भी हो चुकी है। लेकिन अभी तक नीति को कैबिनेट से मंजूरी नहीं मिल पाई है। जबकि हिमाचल प्रदेश भी भांग की खेती के लिए नीति तैयार कर रहा है। हिमाचल का एक दल अध्ययन के लिए उत्तराखंड का दौरा भी कर चुका है।
कई देश कर रहे भांग की खेती और व्यापार
उत्तराखंड की जलवायु औद्योगिक भांग की खेती के अनुकूल है। लेकिन अभी हैंप को प्रदेश में व्यावसायिक रूप नहीं मिला है। विश्व के 40 देशों में हैंप की खेती की जा रही है। इसके रेशे और बीज का इस्तेमाल कई उत्पाद और मेडिकल में किया जा रहा है। इसमें प्रमुख देश अमेरिका, कनाडा, जर्मनी, नीदरलैंड, डेनमार्क, चीन, थाईलैंड शामिल हैं।
इनमें होता है इस्तेमाल
हैंप के बीज का इस्तेमाल, स्नैक फूड, अनाज, सूप, चटनी, मसाला, बेकरी, पास्ता, चॉकलेट, पेय पदार्थ, एनर्जी ड्रिंक, जूस बनाने में किया जाता है। इसके अलावा कास्मेस्टिक उत्पाद, रेशे (फाइबर) का टेक्सटाइल, पेपर, ऑटोमोबाइल, फर्नीचर समेत अन्य कई तरह के उत्पाद बनाए जाते हैं। नीति का अंतिम प्रस्ताव तैयार कर शासन को भेजा गया है। नीति को मंजूरी मिलने के बाद ही प्रदेश में व्यावसायिक रूप से इंडस्ट्रियल हैंप की खेती की जाएगी। इससे किसानों को आर्थिक रूप से लाभ मिलेगा।



