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Home » “हिमालय को रंगता है आत्मा का गुलाल”
उत्तराखण्ड

“हिमालय को रंगता है आत्मा का गुलाल”

Pahad ki KhabarBy Pahad ki KhabarMarch 3, 2026No Comments
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जब हिमालय की श्वेत शिखाओं पर सूर्य की प्रथम किरण सुनहरे आभूषण की भाँति झिलमिलाती है, तब उत्तराखण्ड की वादियाँ एक अनकहे उत्सव की प्रतीक्षा में मौन मुस्कान धारण कर लेती हैं। यह वही समय होता है, जब वसंत प्रकृति के द्वार पर दस्तक देता है और उसके साथ आता है होली का पावन संदेश।
होली यहाँ केवल एक पर्व नहीं, बल्कि जीवन के अंतर्मन में उतरने वाली वह अनुभूति है, जो मनुष्य को स्वयं से मिलाती है। यह रंगों का नहीं, बल्कि भावों का उत्सव है; यह उल्लास का नहीं, बल्कि आत्मा के आलोक का प्रस्फुटन है।

फाल्गुन की पूर्णिमा की संध्या जब ग्राम्य जीवन के मध्य अग्नि प्रज्वलित होती है, तब वह केवल लकड़ियों का दहन नहीं करती, वह मनुष्य के भीतर छिपे अहंकार, ईर्ष्या और द्वेष को भी भस्म करने का मौन आह्वान करती है। भक्त प्रह्लाद की अटूट आस्था और सत्य की विजय की स्मृति में प्रज्वलित यह अग्नि मानो कहती है- “जो सत्य के मार्ग पर अडिग रहता है, वही अग्नि से भी सुरक्षित निकलता है।” होलिका की ज्वाला केवल अतीत की कथा नहीं, बल्कि वर्तमान का संकेत है कि जब तक मनुष्य अपने भीतर की होलिका अर्थात् अपने विकारों का दहन नहीं करेगा, तब तक उसके जीवन में श्रद्धा का वसंत नहीं आ सकता।

जब आकाश में पूर्ण चन्द्र अपनी समस्त कलाओं के साथ प्रकट होता है, तब वह केवल रात्रि को प्रकाशित नहीं करता, वह मनुष्य के जीवन में भी पूर्णता का संकेत देता है। वसंत पंचमी से प्रारम्भ होकर होली तक का यह कालखंड मानो प्रकृति का नवजीवन है। वृक्ष अपने पुराने पत्तों का त्याग कर नवीन हरित वस्त्र धारण करते हैं, मानो यह सन्देश देते हों कि जीवन में नवीनता तभी आती है, जब त्याग का साहस होता है।

उत्तराखण्ड की होली का सबसे अद्भुत स्वरूप उसके संगीत में प्रकट होता है। जब बैठकी होली में राग काफी और बहार के स्वर गूँजते हैं, तब ऐसा प्रतीत होता है मानो स्वयं वसंत स्वर बनकर पृथ्वी पर उतर आया हो। खड़ी होली में जब पुरुष वृत्ताकार होकर नृत्य करते हैं, तब वह वृत्त केवल नृत्य नहीं होता वह समाज की एकता का प्रतीक होता है। उसमें कोई ऊँच-नीच नहीं, कोई भेद नहीं केवल समरसता की परिधि होती है।
महिला होली के मधुर स्वरों में पीढ़ियों की स्मृतियाँ जीवित हो उठती हैं। वे स्वर मानो समय की धारा को रोककर यह कहते हैं कि संस्कृति केवल पुस्तकों में नहीं, बल्कि जीवित परम्पराओं में सांस लेती है।

जब पर्वतीय वनों में बुराँश के लाल पुष्प खिलते हैं, तब ऐसा प्रतीत होता है मानो प्रकृति स्वयं होली खेल रही हो। वायु में मधुर सुगंध भर जाती है, और समस्त वातावरण नवजीवन की अनुभूति से परिपूर्ण हो उठता है। प्रकृति का यह रूप संकेत करता है कि जीवन का सौंदर्य नवीनता में है, परिवर्तन में है, और संतुलन में है। होली हमें यह शिक्षा देती है कि हम प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करें, उसके रंगों को नष्ट नहीं, बल्कि सुरक्षित रखें।

किन्तु आज आवश्यकता इस बात की है कि होली के वास्तविक स्वरूप को समझा जाए। होली उच्छृंखलता का नहीं, मर्यादा का उत्सव है। यह अशिष्टता का नहीं, संस्कृति का प्रतीक है। होली का रंग यदि किसी की आत्मा को आहत करे, तो वह रंग नहीं, कलुष है। होली का शब्द यदि किसी के सम्मान को ठेस पहुँचाए, तो वह उत्सव नहीं, अपसंस्कृति है।
सच्ची होली वही है,
जिसमें रंगों से अधिक स्नेह हो,
शब्दों से अधिक सम्मान हो,
और उल्लास से अधिक मर्यादा हो।

✍🏻धनेश द्विवेदी

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