जून की भरी दोपहरी की छलकती घूप और संघर्ष की वो राहे।
जो थका देती है पैरों को और झुलसा देती है कोमल देह को।
जो रूकना चाहती है किसी छायादार वृक्ष के नीचे।
और आनंद लेना चाहता है मन।
पेडो पर बैठी चिडिया के सुन्दर गीत के साथ मीठी रसीली लीची और आम का मटके के शीतल जल का और थोडे विश्राम का
लेकिन हौसला कहता है रूक जाओगे तो उठ न पाओगे ये वृक्ष ये पंछी ये फल सिर्फ उनके
लिये है जो पहुंच चुके अपनी मंजिल पर।
तुम राही हो सफर के और मंजिल दूर है। तो उठो चलो और बस चलते चलो ये थकने वाले कदम ही आगे चलकर तुम्हारा भाग्य तय करेंगे।
अनीता चमोली “अनू”
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