सीबीएसई के पूर्व संयुक्त सचिव डॉ. रणबीर सिंह पहाड़ों में जगा रहे शिक्षा की अलख, वीआरएस के बाद वंचित बच्चों के भविष्य संवारने का संकल्प

देहरादून। केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) में संयुक्त सचिव जैसे प्रतिष्ठित पद पर लंबे समय तक सेवाएं देने के बाद उत्तराखंड के जौनसार-बावर क्षेत्र के निवासी डॉ. रणबीर सिंह ने अपने जीवन का शेष समय शिक्षा और समाज सेवा को समर्पित करने का निर्णय लिया है। स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (VRS) लेने के बाद वह इन दिनों उत्तराखंड के सुदूर पर्वतीय और जनजातीय क्षेत्रों में शिक्षा की अलख जगाने में जुटे हैं। उनका लक्ष्य केवल बच्चों को शिक्षा से जोड़ना ही नहीं, बल्कि शिक्षा के अभाव में हो रहे पलायन को रोकना और ग्रामीण क्षेत्रों में शैक्षिक वातावरण को मजबूत बनाना भी है।
मूल रूप से देहरादून जनपद की चकराता तहसील के ग्राम कोरुवा निवासी डॉ. रणबीर सिंह ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा ग्रामीण परिवेश में प्राप्त की। सीमित संसाधनों के बीच पढ़ाई करने वाले डॉ. सिंह ने अपने परिश्रम और लगन के बल पर भारतीय स्टेट बैंक, केंद्रीय आयुर्वेद संस्थान झांसी और केंद्रीय पादुका प्रशिक्षण संस्थान आगरा में सेवाएं देने के बाद वर्ष 2002 में सीबीएसई से अपना सफर शुरू किया।
सीबीएसई के क्षेत्रीय कार्यालय इलाहाबाद से शुरू हुआ उनका प्रशासनिक सफर धीरे-धीरे नई ऊंचाइयों तक पहुंचा। उन्होंने प्रयागराज, देहरादून, बेंगलुरु और दिल्ली मुख्यालय में विभिन्न महत्वपूर्ण पदों पर रहते हुए शिक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने में अहम भूमिका निभाई। विशेष रूप से देहरादून क्षेत्रीय कार्यालय में क्षेत्रीय प्रमुख के रूप में कार्य करते हुए उन्होंने विद्यालयों के साथ संवाद और समन्वय को नई दिशा दी।
डॉ. रणबीर सिंह के कार्यकाल में देहरादून क्षेत्र शैक्षिक उपलब्धियों का केंद्र बनकर उभरा। वर्ष 2017, 2018 और 2019 में सीबीएसई की 10वीं और 12वीं बोर्ड परीक्षाओं के टॉपर देहरादून रीजन से रहे। उन्होंने उत्तराखंड सरकार के साथ समन्वय स्थापित कर लगभग 185 अटल उत्कृष्ट विद्यालयों को सीबीएसई से संबद्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके साथ ही केंद्रीय विद्यालयों, जवाहर नवोदय विद्यालयों और राजीव गांधी नवोदय विद्यालयों के साथ बेहतर तालमेल बनाकर क्षेत्र में शिक्षा के स्तर को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने का प्रयास किया।
वर्ष 2021 में संयुक्त सचिव पद पर पदोन्नति के बाद उन्हें बेंगलुरु क्षेत्रीय कार्यालय की जिम्मेदारी मिली। उस समय कर्नाटक क्षेत्रीय कार्यालय सीमित संसाधनों में संचालित हो रहा था। डॉ. सिंह ने वहां कार्यालय की स्थायी व्यवस्था विकसित करने, भवन उपलब्ध कराने और सीबीएसई की प्रशासनिक संरचना को मजबूत करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने राज्य सरकार के सहयोग से अनेक आवासीय विद्यालयों को बोर्ड से संबद्ध कराने की प्रक्रिया को गति दी तथा कर्नाटक के विभिन्न जिलों में विद्यालयों और शिक्षकों के साथ संवाद स्थापित कर बोर्ड की विश्वसनीयता और प्रभाव को बढ़ाया।
अपने पूरे कार्यकाल के दौरान डॉ. रणबीर सिंह ने केवल प्रशासनिक दायित्वों तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि एक प्रेरक वक्ता के रूप में भी हजारों विद्यार्थियों को मार्गदर्शन दिया। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020, ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ और सामाजिक जागरूकता जैसे अभियानों से भी वह लगातार जुड़े रहे। जहां भी उनकी नियुक्ति रही, वहां उन्होंने उत्तराखंड की संस्कृति, मूल्यों और परंपराओं को गौरव के साथ प्रस्तुत किया।
जनवरी 2024 में दिल्ली मुख्यालय में स्थानांतरण के बाद उन्होंने पारिवारिक परिस्थितियों और अपने मूल प्रदेश के प्रति लगाव को देखते हुए 31 जुलाई 2024 को स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेने का निर्णय लिया। इसके बाद उन्होंने अपना पूरा ध्यान समाज सेवा और शिक्षा के क्षेत्र में लगाने का संकल्प लिया।
वर्तमान में डॉ. रणबीर सिंह अपनी सामाजिक संस्था “श्री जयराम सिंह मेमोरियल शिक्षा एवं नारी उत्थान समिति” के माध्यम से उत्तराखंड के दूरस्थ क्षेत्रों में शिक्षा के प्रसार के लिए कार्य कर रहे हैं। उनका उद्देश्य जनजातीय क्षेत्रों, विशेषकर जौनसार-बावर सहित पर्वतीय इलाकों में बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से जोड़ना और शिक्षा के कारण होने वाले पलायन को रोकने में योगदान देना है।
डॉ. रणबीर सिंह का मानना है कि किसी भी राज्य और देश की मजबूती उसकी शिक्षा, संस्कृति और सामाजिक मूल्यों पर निर्भर करती है। उनका कहना है कि यदि शिक्षा का आधार मजबूत होगा तो समाज का विकास स्वतः सुनिश्चित होगा। साथ ही संस्कृति और परंपराओं का संरक्षण भी उतना ही आवश्यक है, क्योंकि संस्कृति के बिना किसी समाज की पहचान अधूरी हो जाती है।
आज जब अधिकांश लोग सेवानिवृत्ति के बाद आरामदायक जीवन की तलाश करते हैं, ऐसे समय में डॉ. रणबीर सिंह का यह निर्णय प्रेरणादायक है। उन्होंने अपने अनुभव, ज्ञान और ऊर्जा को समाज के वंचित वर्गों और ग्रामीण बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के लिए समर्पित कर एक नई मिसाल पेश की है।
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