नर कठोर शैल नहीं, संवेदित प्राण होता है,
अन्तर में मौन व्यथा का भी गान होता है।
जग देखे केवल उसके मुख का धैर्य विलास,
कौन देखता उर में कितना तूफ़ान होता है।
बाल्यकाल से ही उसे यही उपदेश मिला,
अश्रु दुर्बलता हैं, उन्हें नयन पथ न देना।
अपने संतापों को हृदय गुहा में रखकर,
विपदा में भी मुस्कान का दीपक जलाना।
यौवन जब उत्तरदायित्वों का भार सौंपता है,
तब अनेक स्वप्न स्वयं ही विस्मृत हो जाते हैं।
जो आकांक्षाएँ कभी नभ में उड़ती थीं,
वे जीवन यापन की धूल में सो जाती हैं।
पुत्र बनकर आशाओं का वहन करता है,
पिता बनकर परहित में अपना सुख खोता है।
पति बनकर प्रचण्ड झंझाओं से जूझता है,
और अपने अश्रु स्वयं ही पीकर सोता है।
जब साधन क्षीण हों, पथ अन्धकारमय हो,
तब चिन्ताएँ उसकी रात्रि हर लेती हैं।
किन्तु प्रातः पुनः मुख पर आशा धरकर,
वह जग को विश्वास की ज्योति देता है।
कभी-कभी उसका भी मन विश्राम चाहता है,
किसी अपने के सम्मुख व्यथा कहने को।
किन्तु कर्तव्य का दृढ़ हस्त पकड़कर,
वह पुनः चल पड़ता है स्वयं को गढ़ने को।
उसकी निस्तब्धता को जग अहंकार समझता है,
उसकी दूरी को निर्ममता का नाम देता है।
कौन जाने, कितने नर प्रतिदिन एकाकीपन से,
अपने ही अन्तर में महायुद्ध लड़ते हैं।
वे भी चाहते हैं कोई स्नेह से पूछे
कहो, आज मन कैसा है
कोई उनके श्रान्त कन्धों पर कर रखकर कहे
अब कुछ क्षण विश्राम भी तुम्हारा है।
नर की शोभा रूप में नहीं, संघर्षों में बसती है,
उसकी महिमा उसके मौन समर्पण में होती है।
बार-बार बिखरकर पुनः उठ खड़े होने की शक्ति,
उसके जीवन की अमर साधना होती है।
वह गृह की आधारशिला भी है, संरक्षण-छाया भी,
तप्त दिवस में बरगद सा शीतल विस्तार भी।
सबको आश्रय देने वाला यह मौन पथिक,
कई बार स्वयं अपने दुःख का भार भी उठाता है।
अतः जब किसी पुरुष की मुस्कान देखो,
केवल अधरों का प्रस्फुटन मत पढ़ना।
संभव है उसके अन्तर में वेदना का सागर हो,
जो वर्षों से स्वयं में ही सीमित बहता हो।
नर भी मानव है, उसके भी स्वप्न महान हैं,
उसकी आँखों में भी छिपे करुण अरमान हैं।
अश्रु यदि उसके नयनों से कम बहते दिखते हों,
तो भी वे उतने ही सत्य, उतने ही पावन हैं।



