देहरादून। उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने प्रदेश की पारंपरिक कृषि और स्थानीय फसलों की गुणवत्ता को लेकर चिंता जताई है। उन्होंने सोशल मीडिया पर साझा एक पोस्ट में कहा कि भटवाणी-भात खाते समय उन्होंने महसूस किया कि पहले की तुलना में भट्ट (काला सोयाबीन) का आकार काफी छोटा हो गया है, जो चिंता का विषय है।
हरीश रावत ने लिखा कि उत्तराखंड के मध्य हिमालयी क्षेत्रों में मंडुवा के साथ पारंपरिक रूप से उगाई जाने वाली फसलें, जैसे भट्ट, गहत और मास, अपनी विशेष गुणवत्ता और औषधीय गुणों के लिए जानी जाती हैं। उनका कहना है कि भट्ट के आकार और गुणवत्ता में आई गिरावट के पीछे खेतों में जैविक खाद और पारंपरिक खेती की उपेक्षा एक कारण हो सकती है। वहीं, बढ़ती मांग के चलते अन्य क्षेत्रों में भी भट्ट की खेती हो रही है, लेकिन उन किस्मों में उत्तराखंड के पारंपरिक भट्ट जैसे गुण नहीं हैं।
पूर्व मुख्यमंत्री ने राज्य सरकार से इन पारंपरिक फसलों के बीज संरक्षण और गुणवत्ता संरक्षण के लिए ठोस नीति बनाने की मांग की। उन्होंने कहा
उत्तराखंड की कृषि विरासत और स्थानीय बीजों को संरक्षित करना समय की जरूरत है, ताकि भविष्य में इनकी मौलिकता और पोषण गुणवत्ता बनी रहे।
हरीश रावत ने उम्मीद जताई कि मुख्यमंत्री इस विषय को गंभीरता से लेते हुए भरसार कृषि विश्वविद्यालय, अल्मोड़ा स्थित विवेकानंद पर्वतीय कृषि एवं अनुसंधान संस्थानों तथा कृषि विज्ञान केंद्रों को पारंपरिक बीजों के संरक्षण और अनुसंधान के लिए आवश्यक दिशा-निर्देश देंगे। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड की पहचान उसकी पारंपरिक खेती और स्थानीय उत्पादों से है, इसलिए इनके संरक्षण के लिए समय रहते प्रभावी कदम उठाए जाने चाहिए।



