शिक्षक दिवस आने वाला था। विद्यालय में तैयारियाँ जोरों पर थीं। बच्चे अपने प्रिय शिक्षकों के लिए कार्ड बना रहे थे। कोई कविता लिख रहा था, तो कोई अपने शिक्षक के लिए धन्यवाद संदेश।
आरव के हाथ में भी एक सुंदर-सा कार्ड था, लेकिन वह खाली था।
वह कई मिनटों से पेन हाथ में लिए बैठा था। तभी उसकी अध्यापिका उसके पास आईं।
“क्या हुआ आरव? कार्ड तो बहुत सुंदर बनाया है, लेकिन लिखा कुछ नहीं?”
आरव ने धीमे से कहा, “मैम, समझ नहीं आ रहा कि शिक्षक के बारे में ऐसा क्या लिखूँ, जो सिर्फ ‘धन्यवाद’ से आगे हो।”
अध्यापिका उसके पास बैठ गईं। “तो पहले यह बताओ, तुम्हारे लिए शिक्षक कौन होता है?”
“जो हमें पढ़ाता है, हमारी गलतियाँ सुधारता है और अच्छे नंबर लाने में मदद करता है।”
“बस इतना ही?”
आरव सोच में पड़ गया।
अध्यापिका ने पूछा, “कभी ऐसा हुआ है कि तुम्हें रास्ता पता था, फिर भी तुम आगे नहीं बढ़ पाए?”
“हाँ मैम,” आरव बोला, “पिछले साल गणित की परीक्षा से पहले मुझे लगा था कि मुझसे नहीं होगा। सब आता था, फिर भी पेपर देखकर हाथ काँपने लगे थे।”
“और तब तुम्हारे शिक्षक ने क्या किया?”
“उन्होंने कहा था—‘तुम्हें उत्तर नहीं, अपने ऊपर विश्वास की जरूरत है।’ फिर मुझे दोबारा कोशिश करने को कहा।”
अध्यापिका मुस्कुराईं। “यही तो शिक्षक होता है, आरव—जो तुम्हें केवल रास्ता नहीं बताता, बल्कि उस पर चलने का साहस भी देता है।”
उन्होंने मेज़ पर रखी श्रीकृष्ण की छोटी-सी तस्वीर उठाई।
“क्या तुम जानते हो, कृष्ण ने भी यही किया था?”
आरव उत्सुकता से उनकी ओर देखने लगा।
कुरुक्षेत्र में अर्जुन के सामने अपने ही प्रियजन खड़े थे। हाथ में गांडीव था, लेकिन मन संशय से भरा था। कर्तव्य और मोह के बीच उलझकर उसने धनुष नीचे रख दिया।
कृष्ण उसके सारथी थे।
लेकिन उन्होंने अर्जुन की जगह गांडीव नहीं उठाया। उन्होंने उसकी दुविधा सुनी, उसके प्रश्नों के उत्तर दिए और उसे कर्म, धर्म और कर्तव्य का ज्ञान दिया। उसके भीतर विश्वास जगाया और निर्णय लेने की शक्ति अर्जुन को ही दी।
“तो कृष्ण उनके शिक्षक थे?” आरव ने पूछा।
“हाँ,” अध्यापिका बोलीं, “ऐसे गुरु, जिनकी सीख केवल अर्जुन तक सीमित नहीं रही। गीता के माध्यम से उन्होंने पूरी मानवता को जीवन की राह दिखाई।”
आरव कुछ देर शांत रहा। उसे अब समझ आने लगा था कि शिक्षक केवल किताबों के अध्याय पूरे करवाने वाला नहीं होता। शिक्षक वह होता है जो असफलता के बाद कहता है—“एक बार और कोशिश करो।” जो हमारी क्षमता हमसे पहले पहचान लेता है और जब हमारा विश्वास डगमगाता है, तब हमें संभाल लेता है।
उसने कार्ड खोला और लिखा—
“शिक्षक वही है, जो हमारी जगह जीवन का रथ नहीं चलाता, बल्कि हमें उसकी लगाम संभालना सिखाता है।”
फिर उसने कार्ड अध्यापिका के सामने रख दिया।
“मैम, अब समझ आया कि शिक्षक दिवस क्यों मनाते हैं। यह केवल धन्यवाद कहने का दिन नहीं, उन गुरुओं को नमन करने का दिन है, जिन्होंने हमारे जीवन के अँधेरे रास्तों में ज्ञान का दीप जलाया।”
अध्यापिका की आँखें नम हो गईं।
आरव ने कृष्ण की तस्वीर की ओर देखा। अब उसे लग रहा था कि कुरुक्षेत्र केवल इतिहास में नहीं है। आज भी हर विद्यार्थी अपने जीवन में किसी न किसी दुविधा से गुजरता है—भविष्य, सपनों, असफलता और अपेक्षाओं के बीच।
समय बदल गया है, लेकिन अर्जुन की दुविधा नहीं बदली। तब अर्जुन अपने कर्तव्य को लेकर उलझा था, आज का विद्यार्थी अपने भविष्य और सपनों के बीच उलझा है। तब कृष्ण ने सारथी बनकर मार्ग दिखाया था, आज एक सच्चा शिक्षक वही भूमिका निभाता है।
कृष्ण ने अर्जुन का रथ संभाला था; हमारे शिक्षक हमारे जीवन का।
शिक्षक दिवस पर उन सभी गुरुओं को शत-शत नमन, जो हमें केवल पढ़ाते नहीं, बल्कि हमारे भीतर के अर्जुन को पहचानकर अपने पैरों पर खड़ा होना सिखाते हैं।
क्योंकि गुरु केवल वह नहीं, जो हमें पढ़ाए; गुरु वह है, जो हमें हमारे बेहतर रूप से मिलवा दे।




