मंथन मंच के पांचवें सत्र में शोध-पत्र लेखन, जर्नल की गुणवत्ता और शोध की मौलिकता पर विशेषज्ञों ने रखे विचार
टिहरी गढ़वाल। शोध की गुणवत्ता बनाए रखने के साथ उसे प्रतिष्ठित जर्नल में प्रकाशित कराना शोधार्थियों के सामने एक महत्वपूर्ण चुनौती होती है। इसी विषय को केंद्र में रखते हुए हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय के स्वामी रामतीर्थ परिसर, बादशाही थौल में शोधार्थियों के अकादमिक मंच ‘मंथन’ का पांचवां सत्र आयोजित किया गया। इसमें ‘शोध से प्रकाशन तक’ विषय पर विशेष व्याख्यान के माध्यम से शोध-पत्र तैयार करने से लेकर उसके प्रकाशन तक की प्रक्रिया पर विस्तार से चर्चा की गई।
कार्यक्रम में शोधार्थियों को बताया गया कि एक गुणवत्तापूर्ण शोध-पत्र तैयार करने के लिए विषय का चयन, उपलब्ध साहित्य का अध्ययन, मौलिक विचारों का समावेश और प्रमाणिक संदर्भों का उपयोग बेहद जरूरी है। साथ ही शोध-पत्रिका या जर्नल का चयन करते समय उसकी विश्वसनीयता, गुणवत्ता और प्रकाशन मानकों की जांच करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया।
सत्र की शुरुआत मंथन मंच के वरिष्ठ संयोजक एवं संस्कृत विभाग के शोधार्थी धनेश्वर द्विवेदी के संबोधन से हुई। उन्होंने कहा कि शोध का उद्देश्य केवल अकादमिक डिग्री हासिल करना नहीं, बल्कि ज्ञान का विस्तार करना और समाज के सामने नए विचार एवं दृष्टिकोण प्रस्तुत करना भी है। उन्होंने विभिन्न विभागों के शोधार्थियों के बीच संवाद और सहयोग को बढ़ावा देने में मंथन मंच की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया।
मुख्य वक्ता गणित विभाग के शोधार्थी विनीत कुमार ने शोध-पत्र लेखन और प्रकाशन की व्यावहारिक प्रक्रिया समझाई। उन्होंने साहित्यिक चोरी (प्लेजरिज्म) से बचने, संदर्भों का सही उल्लेख करने और शोध में मौलिकता बनाए रखने पर विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि शोध-पत्र प्रकाशित कराने की जल्दबाजी में किसी भी जर्नल का चयन नहीं करना चाहिए। उसकी प्रामाणिकता और अकादमिक गुणवत्ता की जांच करना शोधार्थी की जिम्मेदारी है।
शोध में AI टूल्स की भूमिका पर भी चर्चा
व्याख्यान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा आधुनिक डिजिटल और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित उपकरणों के उपयोग पर केंद्रित रहा। विनीत कुमार ने शोध कार्यों में उपयोगी Elicit, Consensus, Semantic Scholar, ResearchRabbit, NotebookLM, Scite, SciSpace, Zotero, ChatGPT, Perplexity और Claude जैसे टूल्स की कार्यप्रणाली और उपयोगिता से परिचित कराया।
उन्होंने बताया कि इन उपकरणों की मदद से शोध सामग्री खोजने, साहित्य समीक्षा तैयार करने, संदर्भों को व्यवस्थित करने और शोध संबंधी जानकारियां जुटाने में सहायता मिल सकती है। हालांकि, AI से प्राप्त जानकारी को बिना जांचे स्वीकार करना उचित नहीं है। शोधार्थियों को तथ्यों का स्वयं सत्यापन करना चाहिए और शोध की मौलिकता के साथ अकादमिक नैतिकता बनाए रखनी चाहिए।
उल्लेखनीय है कि विनीत कुमार के पांच शोध-पत्र Scopus-अनुक्रमित जर्नलों और Springer में प्रकाशित हो चुके हैं। वे CSIR NET-JRF एवं SRF भी हैं।
मंथन मंच के सह-संयोजक सुनील कुमार ने कहा कि शोधार्थियों को पारंपरिक अध्ययन के साथ आधुनिक तकनीक और डिजिटल संसाधनों का भी उपयोग करना चाहिए। उन्होंने विभिन्न विभागों के शोधार्थियों के बीच साझा गतिविधियों, विचार-विमर्श और अकादमिक सहयोग को बढ़ावा देने की आवश्यकता बताई।
कार्यक्रम का संचालन मंच की समन्वयक यशिका राणा ने किया। उन्होंने वक्ताओं का परिचय देने के साथ चर्चा को आगे बढ़ाया और अंत में सभी अतिथियों, आयोजन समिति तथा प्रतिभागियों का आभार व्यक्त किया। सत्र में विश्वविद्यालय परिसर के विभिन्न विभागों के शोधार्थी और विद्यार्थी मौजूद रहे। प्रतिभागियों ने इसे शोध लेखन और अकादमिक प्रकाशन की समझ विकसित करने की दिशा में उपयोगी पहल बताया।
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