
25 स्कूलों के बच्चों ने भरतनाट्यम और कथक से दिखाई प्रतिभा, शिंजिनी कुलकर्णी के नृत्य और हुसैन ब्रदर्स की कव्वाली ने मोहा मन
देहरादून, 26 अक्टूबर। विरासत महोत्सव-2026 में सोमवार को भारतीय शास्त्रीय नृत्य, उत्तराखंड की लोक संस्कृति और सूफियाना संगीत का अनूठा संगम देखने को मिला। नींबूवाला स्थित हिमालयन सांस्कृतिक केंद्र में आयोजित कार्यक्रम में 25 स्कूलों और शिक्षण संस्थानों के विद्यार्थियों ने भरतनाट्यम और कथक की प्रस्तुतियों से दर्शकों का मन मोह लिया। वहीं, जौनसार-बावर के कलाकारों के झाड़ा लोकगीत और हीरण नृत्य, कथक कलाकार शिंजिनी कुलकर्णी की प्रस्तुति, एवी बनर्जी की ठुमरी-गजल और रामपुर के हुसैन ब्रदर्स की कव्वाली ने महोत्सव की शाम को यादगार बना दिया।
रिच संस्था की ओर से आयोजित विरासत महोत्सव में दिन के कार्यक्रमों में जहां युवा प्रतिभाओं को अपनी कला प्रदर्शित करने का अवसर मिला, वहीं शाम की महफिल में शास्त्रीय संगीत और सूफियाना गायकी ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध किया।
25 स्कूलों के विद्यार्थियों ने प्रस्तुत किया शास्त्रीय नृत्य
विरासत साधना के अंतर्गत विभिन्न स्कूलों और शिक्षण संस्थानों के विद्यार्थियों ने भरतनाट्यम और कथक की प्रस्तुतियां दीं। बच्चों ने अपनी भाव-भंगिमाओं, ताल और लय के माध्यम से भारतीय शास्त्रीय नृत्य की समृद्ध परंपरा की झलक पेश की।
हिल फाउंडेशन स्कूल की हृदयानही उप्रेती, द अर्काडिया स्कूल की वैभवी मुडगल, हिल फाउंडेशन डांस एंड म्यूजिक अकादमी की कीर्ति यादव, सरस्वती संगीत मंदिर की साफिया समायरा, सेंट जोसेफ्स अकादमी की इक्षिता अग्रवाल और माउंट फोर्ट अकादमी की प्रगति गुलाटी सहित कई विद्यार्थियों ने अपनी प्रस्तुतियां दीं।
इसके अलावा पीएम श्री केंद्रीय विद्यालय आईआईपी की प्रज्ञा खंडूरी, नादांता डांस अकादमी की नताशा टोंक, अनाहत अकादमी ऑफ कथक एंड योग की अदिति भट्ट, सोपान संस्कार स्कूल की जानशी, ग्ली म्यूजिक अकादमी की पार्निका झा और नृत्ययोग कथक इंस्टीट्यूट की रियांशी कोकिल्याल ने भी दर्शकों का ध्यान आकर्षित किया।
ब्राइटलैंड्स स्कूल की प्रकृति धीमान, पीएम श्री केंद्रीय विद्यालय ऑर्डनेंस फैक्ट्री की वेदांशी अत्री, द दून स्कूल की पूर्वा सानिडी, निर्मल नृत्यांगन म्यूजिक एंड डांस अकादमी की नंदिनी भट्ट, न्यू दून ब्लॉसम्स स्कूल की कनिष्का जांगिड़, माउंट लिटेरा जी स्कूल की सान्वी शर्मा और डीएवी पीजी कॉलेज की मृगनयनी समेत अन्य प्रतिभागियों ने भी अपनी कला का प्रदर्शन किया।
कॉन्वेंट ऑफ जीसस एंड मैरी, श्यामा प्रसाद मुखर्जी कॉलेज फॉर विमेन, आईएमएस यूनिसन यूनिवर्सिटी, देवभूमि उत्तराखंड यूनिवर्सिटी और स्मॉल बेल्स के प्रतिभागियों ने भी कार्यक्रम में भाग लिया। विरासत साधना का उद्देश्य नई पीढ़ी को भारतीय शास्त्रीय नृत्य की परंपराओं से जोड़ना और उभरते कलाकारों को मंच उपलब्ध कराना है।
जौनसार-बावर के झाड़ा लोकगीत और हीरण नृत्य ने मोहा मन
विरासत महोत्सव में उत्तराखंड की लोक संस्कृति का रंग भी देखने को मिला। जौनसार-बावर के सांस्कृतिक हिलोविट रंगमंच के 20 सदस्यीय दल ने लायक राम के नेतृत्व में पारंपरिक लोकगीतों और नृत्यों की प्रस्तुति दी।
दल ने माता रेणुका की आरती-वंदना से कार्यक्रम की शुरुआत की। इसके बाद प्रसिद्ध झाड़ा लोकगीत की प्रस्तुति दी गई, जबकि समापन हीरण नृत्य के साथ हुआ। लोकगीतों, पारंपरिक वाद्ययंत्रों और नृत्य के मेल ने दर्शकों को जौनसार-बावर की सांस्कृतिक विरासत से परिचित कराया।
प्रस्तुति में सचिन वर्मा और विशाल वर्मा ने मुख्य गायकों की भूमिका निभाई। अरुण ने ढोल, आदि ने धमाऊ, अमित ने रणसिंघा, प्रिंस ने ढोलक, अनुश ने कीबोर्ड और आशीष नेगी ने ऑक्टापैड पर संगत दी। दल के अन्य सदस्यों ने भी प्रस्तुति में योगदान दिया।
शिंजिनी कुलकर्णी के कथक ने बिखेरा जादू
शाम की प्रमुख प्रस्तुतियों में प्रख्यात कथक कलाकार शिंजिनी कुलकर्णी का नृत्य आकर्षण का केंद्र रहा। उन्होंने अपनी प्रस्तुति ‘ताल धमाल नृत्य’ की शुरुआत मां भवानी की स्तुति से की। पारंपरिक कथक शैली में प्रस्तुत इस कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और राजस्थान की लोक संगीत परंपराओं की झलक दिखाई दी।
लोकधुनों और शास्त्रीय कथक के संगम के माध्यम से शिंजिनी ने अपनी भावाभिव्यक्ति, लयकारी और नृत्य कौशल का प्रदर्शन किया। दर्शकों ने उनकी प्रस्तुति की सराहना की।
शिंजिनी कुलकर्णी कथक के महान गुरु पंडित बिरजू महाराज की पोती हैं और कालका-बिंदादिन परंपरा की नौवीं पीढ़ी से जुड़ी हैं। उन्होंने तीन वर्ष की उम्र से कथक का प्रशिक्षण लेना शुरू किया था। अपनी कला यात्रा के दौरान वह खजुराहो नृत्य महोत्सव, संकट मोचन समारोह, ताज महोत्सव, चक्रधर समारोह और कालिदास महोत्सव जैसे प्रतिष्ठित आयोजनों में प्रस्तुति दे चुकी हैं। उन्हें कथक के क्षेत्र में कई सम्मान भी प्राप्त हुए हैं।
एवी बनर्जी की ठुमरी और गजलों ने बांधा समां
शास्त्रीय संगीत की महफिल में गायिका एवी बनर्जी ने ठुमरी, गजल और पारंपरिक बंदिशों से दर्शकों को मंत्रमुग्ध किया। उन्होंने ठुमरी की महान गायिकाओं बेगम अख्तर और शोभा गुर्टू को अपनी प्रस्तुतियों के माध्यम से श्रद्धांजलि दी।
उन्होंने मिश्र खमाज में ठुमरी के साथ ‘सांवरे सलोने बांके श्याम’, ‘हमरी अटरिया पे’ और ‘सांझ ढल गई’ जैसी रचनाएं प्रस्तुत कीं। इसके साथ ही ‘वो जो हममें तुममें करार था’ और ‘मेरे हमनफस’ जैसी गजलों से संगीत प्रेमियों को शास्त्रीय गायन की खूबसूरती से रूबरू कराया।
तबले पर शुभ महाराज और हारमोनियम पर जाकिर धूमपुरी ने संगत की। एवी बनर्जी हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की प्रतिष्ठित कलाकार हैं और ख्याल, ठुमरी, दादरा, गजल, सूफी संगीत तथा बांग्ला राग आधारित गायन में विशेषज्ञता रखती हैं। उन्होंने देश-विदेश के अनेक प्रतिष्ठित संगीत समारोहों में अपनी प्रस्तुतियां दी हैं।
हुसैन ब्रदर्स की कव्वाली ने जमाया रंग
विरासत महोत्सव की शाम में रामपुर से आए साहिल हुसैन और फैजल हुसैन की जोड़ी ने कव्वाली की शानदार प्रस्तुति देकर माहौल को सूफियाना रंग में रंग दिया। पारंपरिक कव्वाली और लोकप्रिय बॉलीवुड धुनों के मिश्रण ने दर्शकों को झूमने पर मजबूर कर दिया।
सात सदस्यीय दल में साहिल और फैजल हुसैन मुख्य कलाकार रहे। अयान हुसैन ने तबले, समीर हुसैन ने ऑक्टापैड, इस्लाम ने गायन, शरीफ ने ढोलक और हम्माद खान ने गिटार पर संगत दी।
प्रस्तुति के दौरान ‘ये जो हल्का-हल्का सुरूर है’, ‘मेरे रश्के कमर’, ‘तेरी पहली नजर’ और ‘तुमको देखा तो ये खयाल आया’ जैसी लोकप्रिय रचनाओं ने खूब रंग जमाया। सूफियाना अंदाज, प्रभावशाली गायकी और आधुनिक वाद्ययंत्रों के मेल ने महफिल में उत्साह भर दिया।
हुसैन ब्रदर्स की प्रस्तुति ने दर्शकों को संगीत की विभिन्न शैलियों का अनुभव कराया। पारंपरिक कव्वाली और लोकप्रिय गीतों के संगम ने विरासत महोत्सव की सांस्कृतिक शाम को खास बना दिया।
भारतीय सांस्कृतिक विरासत का अनूठा संगम
विरासत महोत्सव-2026 की इस शाम में शास्त्रीय नृत्य, लोक संगीत, ठुमरी, गजल और कव्वाली की प्रस्तुतियों ने भारतीय कला और संस्कृति की विविधता को सामने रखा। एक ओर विद्यार्थियों को अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर मिला, तो दूसरी ओर स्थापित कलाकारों ने अपनी प्रस्तुतियों से संगीत प्रेमियों को मंत्रमुग्ध किया। कार्यक्रम ने भारतीय सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने और विभिन्न संगीत परंपराओं को एक मंच पर प्रस्तुत करने का संदेश दिया।




