लोकतंत्र मे जनता पर
जुल्म हो रहा है।
अधिकार पाने को अपने
संसद के आंगन मे पीडित रो रहा है।
क्या गुरू क्या शिष्य क्या
प्रकृति के रक्षक1
लाठियां सब पर बरसा रहा है।
तानाशाह सा हुआ प्रशासन।
याद फिर से गोरों की दिला रहा है।
बेटी पढाओ बेटी बचाओ के बैनर तले।
बेटियों को बेरहमी से मारा जा रहा है।
अर मरने के लिए तो मां बेटों को नहीं जन्मती।
लेकिन हक मांगते ही उस पर भी जान का खतरा मंडरा रहा है।
महंगाई बेरोजगारी के दौर मे लड़ते बच्चों को।
आम आदमी अपने पसीने की रोटी खिला रहा है।
गरीबी बेगारी शिक्षा और भुखमरी की लड़ाई से बेखबर।
देश का मुखिया हमे धर्म का पाठ पढा रहा है।
मंदिर की दानपेटी से।
चौकीदार ही चंद उडा रहा है।
पूछा जब हिसाब दान का।
चंपत दानी को आँख दिखा रहा है।
देश के हर को कोने मे।
भ्रष्टाचार बलात्कार अनैतिकता अपना बिगुल बजा रहा है।
लेकिन हमारा चुना हुआ शासक राजनीति की शैय्या पर अपनी।
आनंद की बंसी बजा रहा है।
अनीता चमोली “अनू”
देहरादून (उत्तराखंड)
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