नवरात्रों में जय-जय कहकर,
मां को जगा रहा इंसान !
अहंकार को अंदर रखकर,
दुख को भगा रहा इंसान !
पाप की चादर ओढ़े बैठा,
ख़ुद को भुला रहा इंसान !
कर्म देखता नहीं वह अपने,
फिर भी बुला रहा भगवान !
बहन, बेटियां, हर नारी पर,
जुल्म ढा रहा है हेवान !
कैसे मां खुश होगी इससे,
जहर बो रहा है इंसान !
कण-कण में मां बसी हुई है,
खोज रहा उसको इंसान !
हृदय खोट ऊपर से हंसता,
मां को भी ठगता इंसान !
घर में भूखी मां है बैठी,
यहां लगाता भोग इंसान !
भ्रूण गर्भ मे मार रहा है,
कन्या पूज रहा इंसान!
गंगा मैली यह करता है,
जिसको पुण्य कहे इंसान!
मैला करके मां भी कहता,
खुद की वाह करे इंसान!
मां की पूजा तभी सफल है,
नारी का कर ले सम्मान !
प्रेम भक्ति और दया भाव से,
धर्म का पालन कर इंसान!
अनीता चमोली” अनू”
देहरादून (उत्तराखंड )





