पैसों की चमक-दमक देखो,
अमीरों का धनतेरस देखो।
अमीर के हिस्से खुशियाँ आईं,
गरीब हो रहा बेबस देखो।
त्योहारों का बाजारीकरण देखो,
खुशियों का भी कारोबार देखो।
मिट्टी के दीपक रूठ गए हैं,
बिजली से चकाचौंध संसार देखो।
आस्था भी अब बिकने लगी है,
पूजा का भी व्यापार देखो।
मिठाइयों में जहर घुला है,
शुद्धता का झूठा प्रचार देखो।
मिलावटखोरों की चाँदी देखो,
जनता की लाचारी देखो।
मीठा खाकर बीमार हुए जो,
अस्पतालों की कतार देखो।
कलयुग का ये व्यवहार देखो,
रिश्तों का गिरता स्तर देखो।
रावण के पुतले जलते हर साल,
मन में पलते दस सिर देखो।
राम के नाम पर मेले लगते,
मन में कितना अंधकार देखो।
मंदिर-मंदिर शीश झुकाते,
कर्मों का व्यापार देखो।
किसको फुर्सत सच अपनाने की,
झूठ का बढ़ता बाजार देखो।
राम तो मिलेंगे निर्मल मन में,
पहले अपना अंतर्मन देखो l
अनीता चमोली “अनू”
देहरादून ( उत्तराखंड )




