संकट के बादल हों या निराशा का अंधकार,
दीपावली है संजीवनी, आशाओं का उपहार।
बुझते मन में ज्योत जगाकर, नव विश्वास जगाए,
जीवन के सूने आँगन में, खुशियों के दीप जलाए।
असंख्य दीपशिखाएँ सदा, पथ को आलोकित करें,
प्रेम, सद्भाव और आत्मीयता से, हर मन को भर दें।
‘परस्पर देवो भव’ की भावना, व्यवहार में अपनाएँ,
एक-दूजे का मान बढ़ाकर, रिश्तों की बगिया महकाएँ।
स्वास्थ्य के प्रति चेतना जगाएँ, निरोगी काया पाएँ,
शिक्षा और स्वच्छता की ज्योति से, अज्ञान मिटाएँ।
संस्कारों और परंपराओं से, हर आँगन को सजाएँ,
कृतज्ञता का भाव हृदय में रख, सच्ची दीपावली मनाएँ।
न धन-दौलत का अहंकार हो, न दिखावे की होड़,
प्रेम और करुणा के धागों से, जोड़ें रिश्तों की डोर।
वंचितों के जीवन में भी, खुशियों का उजियारा लाएँ,
किसी उदास चेहरे पर मुस्कान का एक दीप जलाएँ।
दीपों की इस पावन बेला में, जीवन में खुशियाँ आएँ,
प्रेम, शांति और समृद्धि से, हर घर-आँगन जगमगाएँ।
विचारों और व्यवहार में, अपनेपन की मिठास हो,
मानवता की सुगंध से महके, अपना हर परिवेश हो।
आप सभी को दीपावली की हार्दिक मंगलकामनाएँ!




