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Home » प्रकृति के पुत्र और संस्कृति के प्रहरी हैं आदिवासी
दुनिया

प्रकृति के पुत्र और संस्कृति के प्रहरी हैं आदिवासी

Pahad ki KhabarBy Pahad ki KhabarAugust 10, 2025No Comments
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विश्व आदिवासी दिवस, 9 अगस्त, केवल एक संवैधानिक औपचारिकता नहीं, बल्कि यह सभ्यता की जड़ों और संवेदनशीलता के स्रोत को स्मरण करने का दिन है। यह दिन न केवल आदिवासियों के अस्तित्व, अधिकारों यानी जल, जंगल, जमीन और उनके जीवन की रक्षा का उद्घोष है, बल्कि यह नए भारत के पुनर्निर्माण में उनके अमूल्य योगदान को रेखांकित करने का भी अवसर है। आदिवासी समाज कोई पिछड़ा समूह नहीं, बल्कि वह सांस्कृतिक ऊर्जा का अक्षय स्रोत है, जिसने स्वतंत्रता संग्राम से लेकर पर्यावरण रक्षा तक, सामाजिक समरसता से लेकर आध्यात्मिक परंपराओं तक, हर दिशा में क्रांतिकारी भूमिका निभाई है।
आदिवासी प्रकृति के पुत्र और संस्कृति के प्रहरी है। ‘जो प्रकृति से जुड़ा है, वही मनुष्यत्व का संरक्षक है’-यह वाक्य आदिवासी समाज पर अक्षरशः लागू होता है। आदिवासी शब्द मात्र एक सामाजिक पहचान नहीं, बल्कि एक दर्शन है, सहजता, सामूहिकता, संतुलन और सह-अस्तित्व का दर्शन। करीब 90 प्रतिशत खनिज सम्पदा, वनौषधियां और जैव विविधता इन्हीं के क्षेत्रों में विद्यमान है। उनका जीवन सभ्यता के केंद्र से नहीं, बल्कि संवेदना के मूल से संचालित होता है। वे भले ही ‘वनवासी’ कहलाए गए, परंतु उनका जीवन दर्शन हमें शहरीकरण के आडंबर से बाहर निकालकर स्वाभाविक जीवन की राह दिखाता है। नए भारत में विकास का पर्याय यदि केवल बहुराष्ट्रीय निवेश, चकाचौंध और स्मार्ट सिटी बन गया है, तो आदिवासी समाज उसके विस्थापित मूल्य हैं। जल-जंगल-जमीन के नाम पर किए गए सौदे, खनिज लूट, धार्मिक कन्वर्जन, सांस्कृतिक विघटन और जबरन भूमि अधिग्रहण की घटनाएं केवल उनकी आर्थिक दशा ही नहीं बिगाड़ती, बल्कि उनकी पहचान, संस्कृति, भाषा और परंपरा को भी निगलती जा रही हैं। आज आदिवासी समाज ऋण, अशिक्षा, पलायन, अस्वास्थ्यकर जीवन, बेरोजगारी जैसी समस्याओं से ग्रस्त है। तथाकथित विकास ने उन्हें ‘पराया’ बना दिया है। वे भारत में रहकर भी अपने ही देश में अदृश्य नागरिक बन गए हैं, जिनके पास न राशन कार्ड है, न पहचान पत्र, न ही राजनीतिक प्रतिनिधित्व की शक्ति।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नए भारत की कल्पना में अगर “सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास” का सूत्र वाक्य सार्थक करना है, तो आदिवासी पुनर्जागरण सबसे पहली शर्त है। इस दिशा में गुजरात के प्रसिद्ध जैन संत गणि राजेन्द्र विजयजी का कार्य अत्यंत महत्वपूर्ण है। उनका जीवन आदिवासी क्षेत्रों के लिए संघर्ष, सेवा और सद्भाव की त्रयी बन गया है। वे वर्षों से आदिवासी समाज के उत्थान हेतु शिक्षा, स्वास्थ्य, नशामुक्ति, रोजगार और संस्कृति संवर्धन के अभियान चला रहे हैं। उनका “सुखी परिवार अभियान” केवल परिवार को नहीं, बल्कि पूरे आदिवासी समाज को जागृत करने का एक जनांदोलन बन चुका है। वे आदिवासियों में आत्मबल, आत्मगौरव और आत्मनिर्भरता की भावना जगा रहे हैं। बालिका शिक्षा केंद्र, नैतिक शिक्षा अभियान, युवाओं के लिए स्वावलंबन कार्यशालाएं, महिलाओं के लिए स्वास्थ्य, आदिवासी ग्रामोद्योग, आदिवासी संस्कृति उन्नयन और स्व-सहायता समूहों का गठन-ये सभी उनके प्रयासों का हिस्सा हैं। वे जनजातीय समाज में अहिंसा, नैतिकता और भारतीय संस्कृति के बीज बो रहे हैं, ताकि वे अपने मूल से कटे नहीं, बल्कि गौरव से जुड़े रहें।
आज आदिवासी समाज को जितना खतरा बाह्य आर्थिक और राजनीतिक शोषण से है, उससे कहीं अधिक सांस्कृतिक अस्मिता के विघटन से है। धर्मान्तरण की गतिविधियाँ न केवल धार्मिक परिवर्तनों का परिणाम देती हैं, बल्कि उससे जुड़ी मानसिक गुलामी और राष्ट्र-विरोधी मानसिकता भी पनपती है। गणि राजेन्द्र विजयजी इस खतरे को भली-भांति समझते हैं। उन्होंने धर्मान्तरण के विरुद्ध शांति, संवाद और आध्यात्मिक पुनर्जागरण का मार्ग अपनाया है। उन्होंने जैन धर्म के मूल्यों के साथ-साथ सभी धर्मों के सकारात्मक मूल्यों को आदिवासी जनजीवन से जोड़ा है ताकि वे किसी भी प्रकार की सांस्कृतिक हिंसा से बचें। गणिजी का स्पष्ट मत है कि हर आदिवासी को अपनी जड़ों में झांकना होगा। उसे यह पहचानना होगा कि वह केवल वनवासी नहीं, अपितु संस्कृति का संवाहक है।’ वे आदिवासियों को आत्म निरीक्षण की प्रेरणा देते हैं कि “जो अपने मूल से कट जाता है, वह किसी भी विकास का अधिकारी नहीं बन सकता।” उनकी प्रेरणा से कई आदिवासी युवाओं ने शिक्षा ग्रहण की, रोजगार स्थापित किए, कुटीर उद्योगों की ओर बढ़े और सबसे महत्वपूर्ण, अपने आत्मगौरव को पुनः प्राप्त किया।
आज जब दुनिया कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई), ब्लॉकचेन, ड्रोन टेक्नोलॉजी और डिजिटल नवाचार की ओर अग्रसर हो रही है, तब आदिवासी समाज को भी इस बदलाव की मुख्यधारा से जोड़ना आवश्यक है। तकनीक उनके जीवन में केवल बदलाव का कारक नहीं, बल्कि संरक्षण और सशक्तिकरण का माध्यम बन सकती है। एआई आधारित भाषाई अनुवाद तकनीकों से उनकी बोली और लोककथाओं को डिजिटल रूप में संरक्षित किया जा सकता है, जिससे उनकी सांस्कृतिक विरासत विश्व तक पहुंचे। ड्रोन एवं जीआईएस तकनीक से आदिवासी क्षेत्रों के भू-अधिकार सुरक्षित किए जा सकते हैं। मोबाइल हेल्थ यूनिट्स, टेलीमेडिसिन और डिजिटल शिक्षा से वे दुर्गम क्षेत्रों में भी उन्नत जीवन स्तर पा सकते हैं। नवाचार तभी सार्थक होगा जब वह जंगलों में बसे एक युवा को भी ग्लोबल लर्निंग का अवसर प्रदान करे, न कि उसे अपनी जड़ों से काटे।
आज की वैश्विक दुनिया ‘लोकल टू ग्लोबल’ की सोच को प्रोत्साहित कर रही है और आदिवासी समाज इसमें एक अनमोल भागीदार बन सकता है। उनका पारंपरिक ज्ञान, जैविक खेती, वन औषधियों की समझ, हस्तशिल्प और पर्यावरण संतुलन की परंपराएं विश्व समुदाय के लिए एक वैकल्पिक जीवनदर्शन बन सकती हैं। इसके लिए जरूरी है कि आदिवासी युवा आधुनिक शिक्षा को अपनाएं, लेकिन अपनी संस्कृति और जीवनमूल्यों से जुड़े रहें। उन्हें अपने उद्यमिता कौशल को पहचानने और विकसित करने की आवश्यकता है, जैसे वनोपज आधारित उद्योग, इको-टूरिज्म, वन-हस्तशिल्प, संगीत-नृत्य उत्सव आदि के माध्यम से वे आर्थिक रूप से सशक्त हो सकते हैं। डिजिटल मार्केट प्लेस के जरिए उनके उत्पादों को वैश्विक बाज़ार में पहुंचाया जा सकता है। आत्मनिर्भर भारत की अवधारणा तभी पूर्ण होगी जब आदिवासी समाज भी अपने भीतर से आत्मनिर्भर बनकर आगे बढ़े।
भारत की स्वतंत्रता केवल मैदानों और दरबारों में नहीं, बल्कि जंगलों और पहाड़ियों में भी लड़ी गई थी, जहाँ आदिवासी वीरों ने अंग्रेजी साम्राज्य की नींव हिला दी थी। बिरसा मुंडा जैसे अद्भुत योद्धा और आध्यात्मिक नेता ने न केवल अंग्रेजों के भूमि अधिग्रहण और धर्मान्तरण के विरुद्ध जनजागरण किया, बल्कि एक सशस्त्र संघर्ष को भी नेतृत्व प्रदान किया। झारखंड में चला उनका उलगुलान आंदोलन (महाविप्लव) आदिवासी अस्मिता और स्वाभिमान की एक ऐतिहासिक घोषणा थी। इसी तरह सिद्धू-कान्हू, रानी दुर्गावती, तेलंगाना के कोमराम भीम, भील आंदोलन के गोविंद गुरु, तेनालीराम बावरी, और नारायण सिंह जैसे अनेक आदिवासी सेनानियों ने अपने प्राणों की आहुति देकर यह सिद्ध किया कि भारत की आज़ादी की चिंगारी सबसे पहले आदिवासी अंचलों में धधकी थी। बिरसा मुंडा और आदिवासी वीरों का आजादी में अविस्मरणीय योगदान रहा लेकिन दुर्भाग्यवश, इतिहास की मुख्यधारा में इनके योगदान को उतनी जगह नहीं मिली, जितनी मिलनी चाहिए थी। आज विश्व आदिवासी दिवस हमें इन भूलाए गए नायकों को स्मरण करने, उनका गौरव गान करने और नई पीढ़ी में उनकी प्रेरणा जगाने का अवसर देता है।
विश्व आदिवासी दिवस एक प्रतीक दिवस है, परंतु नीति, नीयत और निष्ठा से इसका पालन आवश्यक है। केवल भाषण, घोषणाएं और योजनाओं से आदिवासी समाज नहीं बदलेगा। उन्हें सुनने, समझने और साथ चलने की आवश्यकता है। उनके जल, जंगल, जमीन के अधिकार की कानूनी एवं नैतिक सुरक्षा हो। उनकी भाषा, परंपरा और नृत्य-संगीत को संरक्षित किया जाए। शिक्षा और स्वास्थ्य के अवसर स्थानीय सांस्कृतिक परिवेश में उपलब्ध कराए जाएं। आदिवासी नेतृत्व को राजनीतिक सशक्तिकरण मिले। नया भारत आदिवासी आत्मा के बिना अधूरा है क्योंकि भारत की आत्मा आदिवासियों की थापों में बसती है, उनके ढोल, मांदर, बांसुरी, उनके लोकगीत, उनके नृत्य और उनकी सरलता में। यदि हमें नया भारत बनाना है तो हमें आदिवासी समाज के साथ खड़ा होना होगा, उनके लिए नहीं, उनके साथ। गणि राजेन्द्र विजयजी जैसे संत इस दिशा में दीपशिखा बनकर मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं। इस विश्व आदिवासी दिवस पर हम केवल स्मरण नहीं, संवेदना, संरक्षण और सहभागिता के साथ इस अद्वितीय समाज के साथ जुड़ें, यही होगा सच्चा राष्ट्रधर्म।

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