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Home » सोना-चांदी की भारी गिरावट
दुनिया

सोना-चांदी की भारी गिरावट

Pahad ki KhabarBy Pahad ki KhabarJanuary 31, 2026No Comments
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एमसीएक्स (मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज) पर सोने और चांदी के भाव में अचानक भारी गिरावट देखने को मिली। फरवरी डिलीवरी वाले सोने का भाव 1,65,795 रुपए से गिरकर 1,49,075 रुपए प्रति 10 ग्राम तक आ गया, यानी लगभग 16,700 रुपए की ऐतिहासिक कमी। चांदी का हाल भी कुछ अलग नहीं रहा। मार्च डिलीवरी वाली चांदी लगभग 2,91,922 रुपए प्रति किलो तक फिसल गई, जो पिछले स्तर से लगभग 1 लाख रुपए कम है। इस अचानक आई गिरावट ने निवेशकों और मुनाफाखोरों की नींद उड़ा दी। कई निवेशक, जिन्होंने सोना और चांदी में लीवरेज्ड पोज़िशन बनाई थी, डर और दबाव में अपनी पोजिशनें बंद करने को मजबूर हो गए। अरबों रुपए का मार्केट वैल्यू मिनटों में घट गया और बाजार में हड़कंप मच गया। विशेषज्ञों ने इसे “ऐतिहासिक गिरावट” बताया और कहा कि ऐसे उतार-चढ़ाव निवेशकों को सावधान रहने का सख्त संदेश देते हैं। इस गिरावट के पीछे मुख्य कारण अमेरिकी डॉलर का मजबूती से उभार और वैश्विक मुनाफाखोरी की तेज गतिविधियां हैं। डॉलर के मजबूत होने का असर सोने और चांदी के भाव पर तुरंत पड़ा, क्योंकि ये धातुएं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर डॉलर में ट्रेड होती हैं। जब डॉलर मजबूत होता है, तो अन्य मुद्राओं में सोने-चांदी की कीमतें बढ़ती हुई नजर आती हैं, जिससे निवेशक तेजी से बेचने लगते हैं। इस बार की गिरावट को और भी गहरा करने वाली वजह अमेरिकी फेडरल रिजर्व के अगले चेयरमैन केविन वार्श को लेकर बढ़ती उम्मीदें हैं। वार्श को महंगाई काबू में रखने के लिए सख्त रुख अपनाने वाला माना जाता है। उनका यह रुख निवेशकों के लिए यह संकेत देता है कि अमेरिकी ब्याज दरें लंबे समय तक कम नहीं रहेंगी। इससे सोने और चांदी में मुनाफाखोरों ने तेजी से बिकवाली शुरू कर दी। विश्लेषकों का कहना है कि अमेरिकी डॉलर मजबूत हुआ, वास्तविक बॉन्ड यील्ड बढ़ीं, और सोने व चांदी में लीवरेज्ड पोज़िशन, जिन्हें करेंसी वैल्यू घटने से बचाव के तौर पर लिया गया था, तेजी से खत्म कर दी गई। इसका परिणाम यह हुआ कि बाजार में अचानक बिकवाली का तूफान आया और अरबों डॉलर का मार्केट वैल्यू मिनटों में साफ हो गया। कई छोटे और कमजोर निवेशक, जो पहले बाजार में तेजी का फायदा उठाने के लिए लेवरेज का इस्तेमाल कर रहे थे, भारी नुकसान के डर से बेचने को मजबूर हुए। आईबीजेए (इंडिया बुलियन एंड ज्वैलर्स एसोसिएशन) के आंकड़े बताते हैं कि 24 कैरेट सोने का भाव 10 ग्राम पर घटकर 1,65,795 रुपए रह गया। इससे पहले यह भाव 1,75,340 रुपए पर बंद हुआ था। वहीं चांदी में भी निवेशकों को झटका लगा। मार्च डिलीवरी वाली चांदी का भाव लगभग 2,91,922 रुपए प्रति किलो तक फिसला। विशेषज्ञों ने कहा कि इस गिरावट का असर केवल “शॉर्ट-टर्म थकावट” का संकेत देता है, न कि लंबे समय की मंदी (बेयर मार्केट) की शुरुआत। लंबी अवधि के बुनियादी कारक अब भी मजबूत बने हुए हैं। केंद्रीय बैंकों द्वारा लगातार सोने की खरीद जारी है। इसके अलावा, इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी), आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई), ग्रीन एनर्जी और इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योगों से चांदी की औद्योगिक मांग तेजी से बढ़ रही है। इन वजहों से चांदी की आपूर्ति में संरचनात्मक कमी बनी हुई है। यही कारण है कि विशेषज्ञों का कहना है कि लंबी अवधि में सोना और चांदी का निवेश फायदेमंद बना रहेगा। विशेषज्ञों ने निवेशकों को सलाह दी है कि इस समय डर के चलते जल्दी निर्णय लेने की बजाय धैर्य और रणनीति के साथ कदम रखें। बाजार में यह गिरावट एक तरह की जरूरी सुधार प्रक्रिया है। जरूरत से ज्यादा सट्टेबाजी और जोखिम भरे निवेश बाहर निकल गए हैं, जिससे आगे चलकर बाजार अधिक स्थिर और नियंत्रित होकर ऊपर जा सकता है। यदि चांदी की कीमत 3 लाख से 3.10 लाख रुपए प्रति किलो के स्तर पर आती है, तो यह निवेशकों के लिए दोबारा खरीदारी का अवसर बन सकता है। इससे चांदी की कीमत संभावित रूप से 3.40 लाख से 3.50 लाख रुपए प्रति किलो तक जा सकती है। सोने के लिए भी विशेषज्ञों का मानना है कि लंबी अवधि में कीमतों में फिर से तेजी आ सकती है, खासकर वैश्विक बाजारों में आर्थिक अनिश्चितता और मुद्रास्फीति के दबाव के चलते। निवेशक और मुनाफाखोर अब इस गिरावट को “सुनहरा अवसर” के तौर पर देख रहे हैं। कई बड़े निवेशक इसे बाजार में उचित एंट्री पॉइंट मान रहे हैं, जबकि छोटे निवेशक अचानक आई गिरावट से डर गए हैं और अपने निवेश निकाल रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यह प्रक्रिया बाजार को अधिक स्वस्थ और नियंत्रित बनाने में मदद करेगी। भारतीय बाजार में सोने और चांदी की कीमतों पर घरेलू और अंतरराष्ट्रीय फैक्टर्स का भी असर पड़ा है। अमेरिका में डॉलर की मजबूती और फेडरल रिजर्व की नीति का सीधा असर भारतीय बाजार पर पड़ता है। डॉलर मजबूत होने पर सोना और चांदी भारतीय रुपये में महंगे प्रतीत होते हैं, जिससे निवेशक तेजी से बेचने लगते हैं। इस गिरावट के बावजूद लंबे समय में कीमती धातुओं का महत्व कम नहीं हुआ है। सोना और चांदी की औद्योगिक और निवेश दोनों ही मांग मजबूत बनी हुई है। वैश्विक अनिश्चितता, मुद्रास्फीति और आर्थिक उतार-चढ़ाव के समय निवेशक अक्सर सोना और चांदी को सुरक्षित विकल्प मानते हैं। शुक्रवार को हुई यह ऐतिहासिक गिरावट यह दर्शाती है कि बाजार में सट्टा और मुनाफाखोरी के कारण अचानक उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि लंबी अवधि में बाजार फिर से सुधरकर और नियंत्रित होकर अपने पुराने स्तरों से ऊपर जा सकता है। सोना और चांदी में शुक्रवार को आई भारी गिरावट न केवल निवेशकों को चेतावनी देती है, बल्कि भविष्य में संभावित अवसरों के लिए दरवाजा भी खोलती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि निवेशक सही समय पर समझदारी से निवेश करें, तो लंबी अवधि में उन्हें अच्छा लाभ मिल सकता है। जनवरी महीने में चांदी ने करीब 42 फीसदी की छलांग लगाई थी, जो किसी एक महीने में इसमें आई अब तक की सबसे बड़ी तेजी मानी जा रही है। वहीं सोने का भाव डॉलर के टर्म्स में 15 फीसदी से अधिक बढ़ा, जो 1999 के बाद की सबसे बड़ी मंथली तेजी थी। अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने का भाव 5,594 डॉलर प्रति औंस के रिकॉर्ड स्तर को छू गया, जबकि चांदी 121 डॉलर प्रति औंस के पार चली गई। इतनी तेज रफ्तार से कीमतों का बढ़ना संकेत था कि बाजार काफी हद तक ओवरबॉट जोन में पहुंच चुका है। इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा ट्रिगर अमेरिका से आया। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संकेत दिया कि वह जल्द ही फेडरल रिजर्व के चेयरमैन जेरोम पॉवेल के उत्तराधिकारी का नाम घोषित करेंगे। बाजार में यह चर्चा तेज हो गई कि फेडरल रिजर्व का अगला अध्यक्ष हॉकिश रुख अपना सकता है। इसका मतलब निकाला गया कि ब्याज दरें लंबे समय तक ऊंची रह सकती हैं और मॉनिटरी पॉलिसी के नरम होने की उम्मीदों को झटका लग सकता है। इस खबर के बाद अमेरिकी डॉलर में मजबूती देखी गई। डॉलर इंडेक्स करीब 0.4 फीसदी चढ़कर 96.60 के स्तर पर पहुंच गया। मजबूत डॉलर का असर सीधे तौर पर सोने और चांदी पर पड़ा, क्योंकि ये डॉलर में कीमत तय होने वाली कमोडिटी हैं। डॉलर मजबूत होने पर दूसरी करेंसी रखने वाले निवेशकों के लिए ये महंगी हो जाती हैं, जिससे बिकवाली बढ़ती है। जब बाजार पहले से ओवरबॉट हो और ऐसी खबर आए, तो मुनाफावसूली तेज हो जाती है। यही वजह रही कि निवेशकों ने ऊपरी स्तरों पर तेजी से प्रॉफिट बुकिंग शुरू कर दी। ज्यादातर कमोडिटी एक्सपर्ट्स और एनालिस्ट्स इस सवाल पर सहमत नहीं हैं कि तेजी खत्म हो चुकी है। उनका मानना है कि आज की गिरावट को एक नॉर्मल करेक्शन की तरह देखा जाना चाहिए। गोल्ड के भाव में लगातार छह महीनों से तेजी रही है, जबकि सिल्वर का भाव नौ महीने से लगातार ऊपर जा रहा था। इतने लंबे समय की तेजी के बाद थोड़ा ठहराव या गिरावट बाजार की सेहत के लिए जरूरी माना जाता है। लॉन्ग-टर्म फंडामेंटल अब भी मजबूत हैं। सोलर पैनल, इलेक्ट्रिक व्हीकल, एआई और डेटा सेंटर्स में सिल्वर की इंडस्ट्रियल डिमांड लगातार बढ़ रही है। दुनिया भर के सेंट्रल बैंक सोने की खरीद जारी रखे हुए हैं। एक्सपर्ट्स का कहना है कि यह समय न तो घबराकर बेचने का है और न ही एकमुश्त खरीदारी करने का। कंजर्वेटिव निवेशकों के लिए सलाह है कि गोल्ड और सिल्वर मिलाकर कुल पोर्टफोलियो का 5-10 फीसदी से ज्यादा हिस्सा न रखें। सिल्वर ज्यादा वोलाटाइल हो चुकी है, जबकि गोल्ड तुलनात्मक रूप से ज्यादा स्थिर है। शॉर्ट टर्म ट्रेडर्स के लिए यह समय जोखिम भरा है, क्योंकि थोड़ी सी खबर पर कीमतों में बड़ी हलचल हो सकती है। कुल मिलाकर तस्वीर साफ है। गोल्ड और सिल्वर में आई यह गिरावट डरने की वजह नहीं, बल्कि समझदारी से फैसले लेने का समय है। लॉन्ग टर्म में इनकी कहानी मजबूत बनी हुई है, लेकिन जल्दबाजी भारी नुकसान करा सकती है।

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