देहरादून में बुग्याल संरक्षण दिवस पर हुआ विशेष सेमिनार, पर्यावरण संरक्षण में उत्कृष्ट योगदान के लिए ‘गिरि गंगा गौरव सम्मान’ और ‘मैती सम्मान’ से विभूतियां सम्मानित

देहरादून, 2 सितंबर 2026। उत्तराखण्ड की प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक पहचान माने जाने वाले बुग्यालों के संरक्षण को लेकर बुधवार को देहरादून में विशेषज्ञों, वैज्ञानिकों, पर्यावरणविदों, शिक्षाविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने व्यापक मंथन किया। संस्कृति विभाग के ऑडिटोरियम में मैती संस्था, उत्तराखण्ड राज्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद् (यूकॉस्ट) तथा हेस्को के संयुक्त तत्वावधान में ‘बुग्याल संरक्षण दिवस’ मनाया गया। इस अवसर पर “उत्तराखण्ड के अल्पाइन घास के मैदानों (बुग्यालों) का संरक्षण : वैज्ञानिक दृष्टिकोण, पारंपरिक ज्ञान एवं संरक्षण कार्यवाही” विषय पर विशेष सेमिनार आयोजित किया गया।
सेमिनार का मुख्य उद्देश्य उत्तराखण्ड के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में स्थित बुग्यालों के संरक्षण से जुड़े वैज्ञानिक शोध, पारंपरिक ज्ञान, स्थानीय समुदायों के अनुभव तथा सरकारी एवं सामाजिक स्तर पर किए जा रहे संरक्षण प्रयासों को एक मंच पर लाना रहा। कार्यक्रम में वक्ताओं ने कहा कि बुग्याल केवल घास के मैदान नहीं हैं, बल्कि हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र के महत्वपूर्ण अंग हैं। इनका सीधा संबंध जैव विविधता, जल स्रोतों, स्थानीय आजीविका, पशुपालन, पर्यटन और उत्तराखण्ड की सांस्कृतिक परंपराओं से है।
स्थानीय समुदायों की भागीदारी पर जोर
कार्यक्रम का शुभारंभ मैती संस्था के संस्थापक एवं सचिव पद्म श्री डॉ. कल्याण सिंह रावत के स्वागत संबोधन से हुआ। उन्होंने बुग्यालों को उत्तराखण्ड की प्राकृतिक और सांस्कृतिक धरोहर बताते हुए कहा कि इनके संरक्षण के लिए केवल सरकारी प्रयास पर्याप्त नहीं हैं। स्थानीय समुदायों को संरक्षण की प्रक्रिया का सक्रिय भागीदार बनाना होगा। उन्होंने बुग्यालों से जुड़े पारंपरिक ज्ञान और स्थानीय अनुभवों को संरक्षित करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया।
उन्होंने कहा कि सदियों से हिमालयी क्षेत्रों में रहने वाले समुदायों ने प्रकृति और बुग्यालों के साथ सह-अस्तित्व की परंपरा विकसित की है। आधुनिक वैज्ञानिक अध्ययन के साथ इस पारंपरिक ज्ञान का समन्वय कर संरक्षण की अधिक प्रभावी रणनीति तैयार की जा सकती है।
वैज्ञानिक अध्ययन से संरक्षण को मिलेगी नई दिशा
सेमिनार में बुग्यालों के पारिस्थितिक महत्व, जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता और मानवीय गतिविधियों से उत्पन्न चुनौतियों पर विशेषज्ञों ने विस्तार से विचार रखे।
भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) के पूर्व निदेशक डॉ. जी. एस. रावत ने बुग्यालों के पारिस्थितिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए इनके संरक्षण के सामने मौजूद विभिन्न चुनौतियों की जानकारी दी। उन्होंने हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र में बुग्यालों की भूमिका को महत्वपूर्ण बताते हुए इनके वैज्ञानिक अध्ययन और दीर्घकालिक संरक्षण की आवश्यकता पर बल दिया।
उत्तराखण्ड अंतरिक्ष उपयोग केंद्र (USAC), देहरादून के वैज्ञानिक डॉ. गजेन्द्र सिंह ने अंतरिक्ष तकनीक और वैज्ञानिक उपकरणों के माध्यम से बुग्यालों की निगरानी, अध्ययन एवं संरक्षण की संभावनाओं पर प्रस्तुति दी। उन्होंने बताया कि आधुनिक तकनीक के माध्यम से उच्च हिमालयी क्षेत्रों में होने वाले पर्यावरणीय बदलावों का अध्ययन अधिक प्रभावी तरीके से किया जा सकता है।
मानसखंड विज्ञान केंद्र, अल्मोड़ा के एमेरिटस वैज्ञानिक डॉ. जी. सी. एस. नेगी ने हिमालयी पर्यावरण, स्थानीय पारंपरिक ज्ञान और बुग्यालों से जुड़े वैज्ञानिक पहलुओं पर अपने विचार साझा किए। वहीं यूकॉस्ट के संयुक्त निदेशक डॉ. डी. पी. उनियाल ने विज्ञान एवं तकनीकी दृष्टिकोण के माध्यम से बुग्याल संरक्षण की दिशा में किए जा सकने वाले प्रयासों पर प्रकाश डाला।
वन विभाग की भूमिका भी महत्वपूर्ण
कार्यक्रम में उत्तराखण्ड वन विभाग की अपर सचिव सुश्री कल्याणी तथा प्रसिद्ध फोटोग्राफर पद्म श्री अनूप साह की गरिमामयी उपस्थिति रही। वक्ताओं ने कहा कि बुग्यालों की संवेदनशीलता को देखते हुए इनके संरक्षण, वैज्ञानिक निगरानी और मानवीय गतिविधियों के संतुलन के लिए वन विभाग, स्थानीय प्रशासन, वैज्ञानिक संस्थानों और स्थानीय समुदायों के बीच बेहतर समन्वय आवश्यक है।
हर वर्ष मनाया जाएगा बुग्याल दिवस : सुबोध उनियाल
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि कैबिनेट मंत्री सुबोध उनियाल ने बुग्यालों के संरक्षण को राज्य के लिए महत्वपूर्ण विषय बताते हुए कहा कि उत्तराखण्ड वन विभाग की ओर से हर वर्ष बुग्याल दिवस मनाया जाएगा। इसका उद्देश्य स्थानीय लोगों के साथ-साथ आम जनमानस को बुग्यालों के महत्व और उनके संरक्षण के प्रति जागरूक करना है।
उन्होंने कहा कि बुग्याल उत्तराखण्ड की प्राकृतिक संपदा हैं और इनके संरक्षण की जिम्मेदारी केवल सरकार की नहीं, बल्कि समाज के प्रत्येक वर्ग की है। उन्होंने सरकार, स्थानीय समुदायों, पर्यावरणीय संस्थाओं और सामाजिक संगठनों के सामूहिक प्रयासों को संरक्षण का आधार बताया।
हिमालय संरक्षण में जनभागीदारी जरूरी : डॉ. अनिल प्रकाश जोशी
कार्यक्रम के अति विशिष्ट अतिथि एवं हेस्को के संस्थापक पद्म भूषण डॉ. अनिल प्रकाश जोशी ने हिमालय दिवस के महत्व और हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण की आवश्यकता पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि हिमालय केवल पहाड़ों की श्रृंखला नहीं, बल्कि देश के पर्यावरणीय और जल सुरक्षा तंत्र का महत्वपूर्ण आधार है।
उन्होंने हिमालय और उसके प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के लिए स्थानीय स्तर पर जागरूकता बढ़ाने तथा आम लोगों को संरक्षण अभियानों से जोड़ने की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि स्थानीय समुदायों की भागीदारी के बिना हिमालयी पर्यावरण का दीर्घकालिक संरक्षण संभव नहीं है।
विज्ञान और तकनीक से संरक्षण को मिले बढ़ावा
यूकॉस्ट के महानिदेशक प्रो. दुर्गेश पंत ने विज्ञान, तकनीकी नवाचार और शोध को हिमालयी पर्यावरण संरक्षण से जोड़ने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों का उपयोग कर बुग्यालों में हो रहे पर्यावरणीय बदलावों की निगरानी और उनका वैज्ञानिक आकलन किया जा सकता है।
मुख्य वन संरक्षक–पर्यावरण, उत्तराखण्ड शासन श्री सुशांत कुमार पटनायक (IFS) ने बुग्यालों के पर्यावरणीय महत्व को रेखांकित करते हुए प्रभावी संरक्षण कार्रवाई और सामुदायिक सहभागिता की आवश्यकता पर जोर दिया।
‘गिरि गंगा गौरव सम्मान’ से तीन विभूतियां सम्मानित
कार्यक्रम के दौरान पर्यावरण, विज्ञान, शिक्षा, सामाजिक जागरूकता और संरक्षण के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वाले व्यक्तित्वों को ‘गिरि गंगा गौरव सम्मान’ से सम्मानित किया गया।
सम्मान प्राप्त करने वालों में—
- डॉ. जी. सी. एस. नेगी, एमेरिटस वैज्ञानिक, मानसखंड विज्ञान केंद्र, अल्मोड़ा — पर्यावरण एवं शोध के क्षेत्र में योगदान के लिए।
- प्रो. दुर्गेश पंत, महानिदेशक, यूकॉस्ट — विज्ञान, तकनीकी नवाचार एवं शिक्षा के क्षेत्र में योगदान के लिए।
- अधिवक्ता ललित जोशी, चेयरमैन, CIMS एवं UIHMT ग्रुप ऑफ कॉलेज — शिक्षा, सामाजिक कार्य और नशे के विरुद्ध जनजागरूकता के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य के लिए।
सात लोगों को मिला ‘मैती सम्मान’
पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने वाले श्री पवन शर्मा, श्री चन्दन नेगी, श्री शम्भू प्रसाद नौटियाल, श्री प्रताप पोखरियाल, श्री जगदम्बा प्रसाद मैठाणी, श्री मनोज ध्यानी और श्री संदीप गुसाईं को ‘मैती सम्मान’ से सम्मानित किया गया।
सम्मान समारोह के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण और प्रकृति के प्रति सामाजिक जिम्मेदारी निभाने वाले लोगों के योगदान को मंच प्रदान किया गया।
कार्यक्रम में जुटे पर्यावरणविद् और प्रकृति प्रेमी
कार्यक्रम का संचालन डॉ. भवतोष शर्मा, वैज्ञानिक, यूकॉस्ट ने किया। इस अवसर पर पद्म श्री बसंती बिष्ट, डॉ. राजेंद्र राणा, संतोष रावत, चंद्रावती असवाल, संगीता रावत, रमेश रावत, मंजीत नेगी सहित अनेक गणमान्य व्यक्ति, पर्यावरणविद्, वैज्ञानिक, शिक्षाविद्, सामाजिक कार्यकर्ता और प्रकृति प्रेमी मौजूद रहे।
बुग्यालों के संरक्षण के लिए सामूहिक रणनीति की जरूरत
सेमिनार के दौरान विशेषज्ञों ने एकमत होकर कहा कि उत्तराखण्ड के बुग्याल राज्य की जैव विविधता और हिमालयी पारिस्थितिकी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इन क्षेत्रों में होने वाले पर्यावरणीय बदलावों का प्रभाव केवल पर्वतीय क्षेत्रों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि जल स्रोतों और व्यापक पारिस्थितिकी तंत्र पर भी पड़ता है।
वक्ताओं ने बुग्याल संरक्षण के लिए वैज्ञानिक अनुसंधान, आधुनिक तकनीक, पारंपरिक ज्ञान, स्थानीय समुदायों की भागीदारी और प्रभावी सरकारी नीतियों के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता बताई। साथ ही बुग्यालों के प्रति पर्यटकों और आम नागरिकों में जिम्मेदार व्यवहार तथा पर्यावरणीय संवेदनशीलता विकसित करने पर भी जोर दिया गया।
सेमिनार का संदेश स्पष्ट रहा कि बुग्यालों का संरक्षण केवल पर्यावरण का विषय नहीं, बल्कि उत्तराखण्ड की जल सुरक्षा, जैव विविधता, स्थानीय आजीविका और सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखने की साझा जिम्मेदारी है।




