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Home » अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस केवल एक कैलेंडर की तारीख नहीं है, बल्कि यह हमें याद दिलाता है कि आज की दुनिया में परिवर्तन का सबसे बड़ा वाहक युवा हैं।
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अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस केवल एक कैलेंडर की तारीख नहीं है, बल्कि यह हमें याद दिलाता है कि आज की दुनिया में परिवर्तन का सबसे बड़ा वाहक युवा हैं।

Pahad ki KhabarBy Pahad ki KhabarAugust 12, 2025No Comments
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संयुक्त राष्ट्र ने युवाओं के अधिकार, अवसर और योगदान को मान्यता देने के लिए तय किया है, लेकिन इसकी वास्तविक सार्थकता तभी है जब हम युवाओं को केवल ‘भविष्य के नेता’ कहकर टालें नहीं, बल्कि उन्हें वर्तमान का निर्णायक शक्ति केंद्र मानें। आज भारत की आबादी में लगभग 65 प्रतिशत हिस्सा 35 वर्ष से कम उम्र का है। यह केवल सांख्यिकीय तथ्य नहीं, बल्कि संभावनाओं का महासागर है। लेकिन इन संभावनाओं को दिशा देने के लिए केवल शिक्षा या नौकरी पर्याप्त नहीं; दृष्टि, मूल्यों और संकल्प की भी उतनी ही आवश्यकता है। क्योंकि युवा क्रांति का प्रतीक है, ऊर्जा का स्रोत है, इस क्रांति एवं ऊर्जा का उपयोग रचनात्मक एवं सृजनात्मक हो, इसी ध्येय से सारी दुनिया प्रतिवर्ष में सन् 2000 में अंतर्राष्ट्रीय युवा दिवस का आयोजन आरम्भ किया गया था। यह दिवस मनाने का मतलब है कि युवाशक्ति का उपयोग विध्वंस में न होकर निर्माण में हो। युवा, शांति और सुरक्षा पर सुरक्षा परिषद का प्रस्ताव 2250 (9 दिसंबर 2015) शांति को बढ़ावा देने और उग्रवाद का मुकाबला करने में युवा शांति निर्माताओं को शामिल करने की तत्काल आवश्यकता की अभूतपूर्व स्वीकृति का प्रतिनिधित्व करता है, और स्पष्ट रूप से युवाओं को वैश्विक प्रयासों में महत्वपूर्ण भागीदार के रूप में स्थान देता है।
स्वामी विवेकानंद का आह्वान आज भी गूंजता है-’उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य की प्राप्ति न हो जाए।’ इस अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस पर हमें न केवल युवाओं की सराहना करनी है, बल्कि उन्हें जिम्मेदारी सौंपनी है, क्योंकि वे सिर्फ कल के नहीं, बल्कि आज के भी निर्माता हैं। स्वामी विवेकानन्द ने भारत के नवनिर्माण के लिये मात्र सौ युवकों की अपेक्षा की थी। क्योंकि वे जानते थे कि युवा ‘विजनरी’ होते हैं और उनका विजन दूरगामी एवं बुनियादी होता है। उनमें नव निर्माण करने की क्षमता होती है। नया भारत निर्मित करते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को भी युवाशक्ति को आगे लाना होगा। युवा किसी भी देश का वर्तमान और भविष्य हैं। वो देश की नींव हैं, जिस पर देश की प्रगति और विकास निर्भर करता है। लेकिन आज भी बहुत से ऐसे विकसित और विकासशील राष्ट्र हैं, जहाँ नौजवान ऊर्जा व्यर्थ हो रही है। कई देशों में शिक्षा के लिए जरूरी आधारभूत संरचना की कमी है तो कहीं प्रछन्न बेरोजगारी जैसे हालात हैं। युवा अनेक विसंगतियों एवं बुराइयों से घिरे हैं।
युवाओं में जोश होता है, लेकिन बिना दिशा का जोश आग भी लगा सकता है और दीपक भी जला सकता है। यह चुनाव हमारे हाथ में हैकृहम उन्हें सृजनशील बदलाव के शिल्पी बनाते हैं या अराजकता के उपकरण। महात्मा गांधी ने कहा थाकृष्आप वह बदलाव बनें जो आप दुनिया में देखना चाहते हैं।’ युवा इस वाक्य को केवल नारा न बनाएं, बल्कि अपने जीवन का सूत्रवाक्य बनाएं। आज के युवा के सामने बेरोजगारी, मानसिक तनाव, नशे की लत, डिजिटल व्यसन, और सामाजिक असमानता जैसी चुनौतियां हैं। लेकिन इन्हीं के बीच नवाचार, स्टार्टअप संस्कृति, डिजिटल क्रांति, और वैश्विक मंच पर पहचान बनाने के अनगिनत अवसर भी हैं। जरूरत है-आत्मनिर्भर सोच की, नैतिकता आधारित नेतृत्व की और सतत विकास के प्रति प्रतिबद्धता की। जब जलवायु परिवर्तन, शांति स्थापना, मानवाधिकार, और वैश्विक न्याय जैसे मुद्दों की बात आती है, तो दुनिया युवाओं की आवाज सुनना चाहती है। स्वीडन की ग्रेटा थनबर्ग से लेकर भारत के अनगिनत सामाजिक नवप्रवर्तकों तक-युवा यह साबित कर रहे हैं कि उम्र कोई बाधा नहीं, दृष्टि और साहस ही असली पूंजी है। युवाओं के हाथ में केवल भविष्य की मशाल नहीं, बल्कि वर्तमान की बागडोर भी है। अगर वे खुद को केवल दर्शक बनाकर रखेंगे, तो इतिहास उनके बिना आगे बढ़ जाएगा। लेकिन अगर वे सक्रिय भागीदारी करेंगे, तो इतिहास उन्हें अपने पन्नों में सुनहरे अक्षरों में दर्ज करेगा।
अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस मनाते हुए मूल प्रश्न है कि क्या हमारे आज के नौजवान भारत को एक सक्षम देश बनाने का स्वप्न देखते हैं? या कि हमारी वर्तमान युवा पीढ़ी केवल उपभोक्तावादी संस्कृति से जन्मी आत्मकेन्द्रित पीढ़ी है? दोनों में से सच क्या है? दरअसल हमारी युवा पीढ़ी महज स्वप्नजीवी पीढ़ी नहीं है, वह रोज यथार्थ से जूझती है, उसके सामने भ्रष्टाचार, आरक्षण का बिगड़ता स्वरूप, महंगी होती जाती शिक्षा, कैरियर की चुनौती और उनकी नैसर्गिक प्रतिभा को कुचलने की राजनीति विसंगतियां जैसी तमाम विषमताओं और अवरोधों की ढेरों समस्याएं भी हैं। उनके पास कोरे स्वप्न ही नहीं, बल्कि आंखों में किरकिराता सच भी है। इन जटिल स्थितियों से लौहा लेने की ताकत युवक में ही हैं। क्योंकि युवक शब्द क्रांति का प्रतीक है। विचारों के नभ पर कल्पना के इन्द्रधनुष टांगने मात्र से कुछ होने वाला नहीं है, बेहतर जिंदगी जीने के लिए मनुष्य को संघर्ष आमंत्रित करना होगा। वह संघर्ष होगा विश्व के सार्वभौम मूल्यों और मानदंडों को बदलने के लिए। सत्ता, संपदा, धर्म और जाति के आधार पर मनुष्य का जो मूल्यांकन हो रहा है मानव जाति के हित में नहीं है। दूसरा भी तो कोई पैमाना होगा, मनुष्य के अंकन का, पर उसे काम में नहीं लिया जा रहा है। क्योंकि उसमें अहं को पोषण देने की सुविधा नहीं है। क्योंकि वह रास्ता जोखिम भरा है। क्योंकि उस रास्तें में व्यक्तिगत स्वार्थ और व्यामोह की सुरक्षा नहीं है।
युवापीढ़ी पर यह दायित्व है कि संघर्ष को आमंत्रित करे, मूल्यांकन का पैमाना बदले, अहं को तोड़े, जोखिम का स्वागत करे, स्वार्थ और व्यामोह से ऊपर उठे। युवा दिवस मनाने का मतलब है-एक दिन युवकों के नाम। इस दिन पूरे विश्व में युवापीढ़ी के संदर्भ में चर्चा होगी, उसके हृास और विकास पर चिंतन होगा, उसकी समस्याओं पर विचार होगा और ऐसे रास्ते खोजे जायेंगे, जो इस पीढ़ी को एक सुंदर भविष्य दे सकें। इसका सबसे पहला लाभ तो यही है कि संसार भर में एक वातावरण बन रहा है युवापीढ़ी को अधिक सक्षम और तेजस्वी बनाने के लिए।
युवकों से संबंधित संस्थाओं को सचेत और सावधान करना होगा और कोई ऐसा सकारात्मक कार्यक्रम हाथ में लेना होगा, जिसमें निर्माण की प्रक्रिया अपनी गति से चलती रहे। विशेषतः राजनीति में युवकों की सकारात्मक एवं सक्रिय भागीदारी को सुनिश्चित करना होगा। अर्नाल्ड टायनबी ने अपनी पुस्तक ‘सरवाइविंग द फ्यूचर’ में नवजवानों को सलाह देते हुए लिखा है ‘मरते दम तक जवानी के जोश को कायम रखना।’ उनको यह इसलिये कहना पड़ा क्योंकि जो जोश उनमें भरा जाता है, यौवन के परिपक्व होते ही उन चीजों को भावुकता या जवानी का जोश कहकर भूलने लगते हैं। वे नीति विरोधी काम करने लगते है, गलत और विध्वंसकारी दिशाओं की ओर अग्रसर हो जाते हैं। इसलिये युवकों के लिये जरूरी है कि वे जोश के साथ होश कायम रखे। इसीलिये सुकरात को भी नवयुवकों पर पूरा भरोसा था। वे जानते थे कि नवयुवकों का दिमाग उपजाऊ जमीन की तरह होता है। उन्नत विचारों का जो बीज बो दें तो वही उग आता है। एथेंस के शासकों को सुकरात का इसलिए भय था कि वह नवयुवकों के दिमाग में अच्छे विचारों के बीज बोनेे की क्षमता रखता था। आज की युवापीढ़ी में उर्वर दिमागों की कमी नहीं है मगर उनके दिलो दिमाग में विचारों के बीज पल्लवित कराने वालेे स्वामी विवेकानन्द और सुकरात जैसे लोग दिनोंदिन घटते जा रहे हैं।
कला, संगीत और साहित्य के क्षेत्र में भी ऐसे कितने लोग हैं, जो नई प्रतिभाओं को उभारने के लिए ईमानदारी से प्रयास करते हैं? हेनरी मिलर ने एक बार कहा था- ‘‘मैं जमीन से उगने वाले हर तिनके को नमन करता हूं। इसी प्रकार मुझे हर नवयुवक में वट वृक्ष बनने की क्षमता नजर आती है।’’ महादेवी वर्मा ने भी कहा है ‘‘बलवान राष्ट्र वही होता है जिसकी तरुणाई सबल होती है।’’ इसीलिये युवापीढ़ी पर यह दायित्व है कि वह युवा दिवस पर कोई ऐसी क्रांति घटित करे, जिससे युवकों की जीवनशैली में रचनात्मक परिवर्तन आ सके, हिंसा-आतंक-विध्वंस की राह को छोड़कर वे निर्माण की नयी पगडंडियों पर अग्रसर हो सके।

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