दिल जल रहा है, जिगर जल रहा है,
मेरे प्यारे वतन का हर घर जल
रहा है।
बच्चे जल रहे हैं, आसमाँ जल रहा है,
किसी की लापरवाही से किसी का जहाँ जल रहा है।
मानवता झुलस रही है, हर धर्म जल रहा है,
सत्ता की आग में विकास का भ्रम जल रहा है।
कानून जल रहा है, बेगुनाह जल रहे हैं,
झूठ की लपटों से सच के सबूत जल रहे हैं।
बेटियाँ जल रही हैं, बेटे भी मर रहे हैं,
प्रेम की आड़ में धोखे के खेल चल रहे हैं।
धरती जल रही है और वन जल रहे हैं,
बेरोजगारी की लपटों में खुशहाली के उपवन जल रहे हैं।
शहर जल रहा है, हृदय का मर्म जल रहा है,
भ्रष्टाचार की अग्नि में मेरा वतन जल रहा है।
बहुत जल चुका वतन, अब इसे बचाना होगा,
उम्मीद की चिंगारी से सपनों का दीप जलाना होगा।
अनीता चमोली “अनू, ”
देहरादून (उत्तराखंड )





