टूटकर वो बिखर गया,
फिर भी कैसे निखर गया !
दिखने में था एकपसली,
चट्टानों से भिड़ गया !
आसमान का तपता सूरज,
उसके पैरों को जला रहा !
ख्वाब एक जो उसने देखा,
स्वप्न से उसको जगा रहा !
लम्बी जीवन की राहों में,
कुछ अपने पीछे छूट गए !
उलझा न सके भावों के भँवर में,
हौंसलों से उसके टूट गए !
हंसती थी दुनिया जिस पर,
वो सादगी उसने छोड़ दी !
जिस तरफ बह रही थी नदिया,
मौजें भी उस तरफ मोड़ दी !
जो टूट रहा था अंदर से,
वो जाने कैसे खड़ा हुआ !
मेहनत हिम्मत की दम से,
छोटा कद कब बड़ा हुआ !
मक्कारो की दुनिया से,
दुर्गंध स्वार्थ की आती है !
बूचड़खाना उनका ऐसा,
इंसानियत जहां मर जाती है !
जाते– जाते भी अपने,
पद-चिन्ह वहां धर जाती है !
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अनीता चमोली ” अनू ” ✍🏻
देहरादून, उत्तराखंड !




